Saturday, 2 October 2010

स्मृतियों से वो एक दिन

सन् उन्नीस सौ सतानवे की कोई ठंडी सुबह....

मैं छत पर औंधे पड़े हुए सोचने में मग्न हूँ । सर्दियों की धूप भी कितनी मुलायम होती है । माँ नीचे स्नान कर रही होंगी, उसके बाद पूजा और फिर मुझे पुकारेगी । मैं आवाज़ दूँगा "हाँ माँ, अभी आता हूँ" । हालाँकि तब भी मेरे पास कोई काम नहीं होगा किन्तु देर लगा कर स्वंय का व्यस्त होना जताउँगा । फिर माँ पूँछेंगी "क्या कर रहे थे ?" कब से पुकार रही हूँ और फिर दबी आवाज़ में कहेंगी "ये लड़का भी न जाने कहाँ खोया रहता है" । माँ फिर मेरे सामने नाश्ते की थाली रख देंगी और मेरे खाते समय, मेरे सर पर हाथ फेरेंगी । फिर वो कहेंगी "क्या सोचते रहते हो ?" । मैं खाता रहूँगा और इसी बीच में उत्तर कहीं खो जायेगा । उन्हें उत्तर की प्रतीक्षा नहीं होगी । मैं उठकर आधा गिलास पानी पियूँगा और आधे से हाथ धो लूँगा । माँ के पल्लू से हाथ पौछूँगा और देहरी से बाहर चला जाउँगा ।

करवट लेता हूँ और देहरी से बाहर के संसार में पहुँच जाता हूँ ।

उसका आज जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है । न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।

उसके सख्त निर्देश हैं कि वह अपना जन्म दिन अँग्रेजी तरीके से मनाएगी । इसीलिए कल ही यह बताकर उसने मुझे उलझन में डाल दिया कि वो रात के बारह बजकर एक सेकंड पर मुझे अपने सामने देखना चाहती है । मैं इस बात पर उसकी कम उम्र पर चिढ़ता हूँ । सोचता हूँ कि यदि हम पच्चीस बरस के होते, तो वो कभी ऐसा जोखिम उठाने के लिए नहीं कहती । फिर स्वंय की इस समझदारी पर संतुष्ट सा महसूस करता हूँ ।

रात के दस बज रहे हैं और मेरा दिल घड़ी की टिक-टिक से भी तेज़ आवाज़ कर रहा है । माँ कमरे में दूध का गिलास रखकर चली गयी हैं । जाते जाते कह गयी हैं "सो जाओ और सुबह जल्दी उठकर पढ़ लेना" । उनकी संतुष्टि के लिए लाइट बंद कर देता हूँ । मैं हमेशा सुबह देर से उठता हूँ और माँ हमेशा सुबह जल्दी उठने का बोलकर जाती हैं ।

ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हो गए हैं । उठकर किताबों में दुबके गुलाब को बाहर निकालता हूँ, सिरहाने से गुलाबी कार्ड को हाथों में ले, उसकी छत पर रवाना होने के लिए स्वंय को तैयार करता हूँ । उसने कल रोज़ जाते-जाते दो बार याद दिलाया था कि हम उसकी छत पर मिलेंगे । मैं पहली दफा बिना बताये उसकी छत पर जाने के ख्याल से पसीना-पसीना हुआ जा रहा हूँ ।

अपनी छत से लगी दो छतों को फलाँग कर उसकी छत पर पहुँचता हूँ । ग्यारह बजकर उनसठ मिनट हो गए हैं । वो अभी तक नहीं आई । सूनी पड़ी गलियों में कुत्ते गश्त लगा रहे हैं । आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं । छतों पर हल्की धुंध की चादर तन गयी हैं । दूर से बारह के टनटनाने की आवाज़ आई है । छत पर किसी के आने की आहट, दिल धकधक करने लगा, वो शौल ओढ़े हुए बिलकुल नज़दीक आ गयी । उसे पहचान कर पहली दफा इतनी ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ ।

"हैप्पी बर्थ डे, माय लव" सुनकर वो खिलखिला जाती है । उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर "हैप्पी बर्थ डे" बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । "अच्छा तो अब मैं चलूँ" ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से चिपके हुए हैं । पहली बार उसकी गर्म साँसों और होठों को महसूस कर रहा हूँ ।

"अच्छा तो अब मैं चलूँ" कुछ देर बाद अलग होते हुए फिर से कहता हूँ । अबकी वो मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाती है । मैं पहली छत की दीवार फलाँग कर चलने को होता हूँ । वो अभी भी छत पर है । फिर से लौट पड़ता हूँ । पास आकर "आई लव यू" कहता हूँ । वो मुस्कुरा जाती है और प्रतिउत्तर में "आई लव यू टू" कहती है ।

और फिर वे सभी क्षण स्मृतियों में लॉक हो जाते हैं ....

15 comments:

monali said...

Koi chitra sa aankho k aage ghum jata hai ye sab padhte huye...aur apni kuchh yaadein bhi...

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

सखा/ सहेली,
स्वाद आ गया,
याद आ गया.............
वो छिप-छिप के मिलना, आई लव यू कहना, एक कटोरी आईसक्रीम में दो चम्मचों का टकराना, बेवजह मुस्कुराना, नज़रों के पेंच लड़ना, और ना जाने क्या-क्या!?!?!
हाय! मैं शर्म से लाल हुआ.......
शुक्रिया मोनाली का के उसने मुझे आपके चिट्ठे का लिंक भेजा!
आशीष

richa said...

मिश्री सी मीठी पोस्ट... पहले प्यार सा प्यारा ब्लॉग... थैंक्स टू माय फ्रेंड जिसने इस ब्लॉग का लिंक दिया... उम्मीद है ये मिठास कभी कम नहीं होगी इस ब्लॉग से... पाठकों से अनुरोध है अपना ब्लड शुगर लेवल रेगुलरली चेक कराते रहें :)

JHAROKHA said...

Ek bahut sundar shabd chitr dil ko chhoone vala ---hardik shubhkamnayen.
Poonam

छायादेवी पंवार said...

बहुत उम्दा रचना।आभार!

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत अच्छा प्रयास। आप अपने मकसद में कामयाब हों। शुभकामनाएं।

वीना said...

सुंदर पोस्ट

Mahendra Arya said...

:-)

कुश said...

पूरी की पूरी फिल्म चला दी आँखों के सामने.. बहुत खूबसूरत ख्याल है..
बस माँ की हर डायलोग के बाद छोटे कहना ठीक नहीं लगता.. रखा भी जाए तो कोई प्रोब्लम नहीं पर ना रखा जाये तो स्वाद और बढ़ जाए..

राकेश कौशिक said...

सजीव प्रस्तुति

Patali-The-Village said...

बहुत अच्छा प्रयास।

संगीता पुरी said...

इस सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सुन्दर. खिली-खिली सी.

वन्दना said...

बेहद मिठास है।

 

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