Monday, 27 September 2010

उसकी होम साइंस

मैं फिजिक्स का विद्यार्थी हूँ और होम साइंस की किताब चुपके से पढ़ रहा हूँ । पढने के बाद अंगडाई लेता हूँ जैसे हवाई जहाज कैसे बनता है, जान लिया हो । बाहर देहरी पर दस्तक हुई है, चुपके से किताब को यथास्थान रख देता हूँ और फिजिक्स के डेरीवेशन की किसी पंक्ति पर लटक जाता हूँ ।

बाहर मनु और उसमें कुछ खुसर-पुसर हो रही है, फिर खी-खी की आवाज़ । उठता हूँ और जाकर घड़े से गिलास भर पानी, बूँद-बूँद पीता हूँ । चोर निगाहों से उसे देखता हूँ । पकड़ा जाता हूँ और मुस्कुराकर छोड़ दिया जाता हूँ । रिहा होकर फिजिक्स के बगीचे में चला जाता हूँ ।

जानता हूँ, अब वो कहेगी "अच्छा मनु, अब मैं चलती हूँ वरना माँ डाँटेगी", देहरी के बाहर निकलेगी, वापस मुड़ेगी और मेरे बगीचे में आकर होम साइंस का जहाज उड़ा कर चली जायेगी" । दो बार में अपनी किताब लेकर जाने की उसकी छह महीने पुरानी आदत है ।

आज मनु, माँ के साथ बाहर गयी है । मैं सर्किल के सवालों की परिधि में हूँ । बाहर निकलता हूँ, एक और सर्किल, और फिर दो आँखें बना रहा हूँ, एक नाक और बाल खराब हो गये । "देखा, कर दिये ना खराब" देहरी पर वो खड़ी मुस्कुरा रही है ।

-उसके पूँछने से पहले जवाब देता हूँ"मनु तो बाहर गयी है" ।
-"अच्छा, मुझे नहीं पता था " कहते हुए मेरा बुद्धू होना जताती है ।
-मेरे पास शब्द नहीं ।
-"गाज़र का हलुआ लेकर आयी थी । मनु के लिये, तुम मत खाना ।" बाद के शब्द प्यार से बोलती है ।

टिफिन रखती है और चल देती है । मुड़कर वापस आती है "अच्छा वैसे किसकी शक्ल बिगाड़ने की कोशिश थी" । मैं शरमा जाता हूँ । "देखो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा है" कहती हुई बैठ जाती है । मैं गणितज्ञ होने की कोशिश में लग जाता हूँ । वो होम साइंस के शस्त्र निकाल लेती है ।

-अच्छा तुम ऐसे हो या बनने की कोशिश करते हो ?
-चुप्पी, कोई जवाब नहीं ।

वो हाथ से पैन छीन लेती है ।
- "नम्रता" पहली बार उसके सामने उसका नाम लेकर बनने की कोशिश करता हूँ ।
-"हाँ, नम्रता, फिर आगे, आगे कुछ" वो देखकर मुस्कुरा रही है ।
-यू आर टू मच
-यस, आई एम
-पैन दो
-बस, पैन के लिये इतने नाटक ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-बुद्धुराम, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता ।

वो उठती है । पैन फैंक कर देती है "लो रखो इसे सीने से लगाकर" । चल देती है । देहरी के बाहर पहुँच कर याद दिलाती है "हलुआ तुम्हारे लिये ही लायी थी, मनु सुबह खा चुकी है" ।

कमरे में उसकी खुशबु घुल सी गयी है । लम्बी साँस लेता हूँ और सर्किल बनाकर रुक जाता हूँ । याद हो आता है, उसे उसका चेहरा बहुत प्यारा है । सोचकर मुस्कुरा उठता हूँ , हमारी पसंद कितनी मिलती है ।

फिर से सर्किल की परिधि पर घूम रहा हूँ, राउंड एंड राउंड एंड राउंड....

9 comments:

Udan Tashtari said...

राउंड एंड राउंड एंड राउंड...हम तो पढ़कर ही घूम रहे हैं...एक गाना भी बज रहा है....

आईला रेSSSSSSSSSSSSSSS.......

monali said...

Kaahe ye rog paal rahe hain???? jo soch kar aaj hans rahe hain...wahi baatein kal rone ki wejeh ban jayengi... waise very beautifully expressed feelings

richa said...

पोस्ट पढ़ते हुए एक मुस्कुराहट काबिज़ हो गयी होंठों पर... हम तो आपकी पोस्ट की परिधि में घूम रहे हैं "राउंड एंड राउंड एंड राउंड...." :)

mukti said...

बड़ी मासूम सी पोस्ट है. कैसे इतना स्वाभाविक लिख लेते हो? घूमने जैसी कोई बात ही नहीं. फिर जाने क्यों घूम रहे हो?
और हाँ, मुस्कराहट मेरे चेहरे पर भी आ गयी है.

कुश said...

इनोसेंट लव से लबरेज..

बी एस पाबला said...

मुस्कराहट तो मेरे चेहरे पर भी आ गयी है

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

बहुत प्यारा सा... मूड बना गया..

अनूप शुक्ल said...

बहुत प्यारी पोस्ट!

shikha varshney said...

बहुत प्यारी मोहक सी पोस्ट .मासूमियत से भरी हुई..

 

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