Friday, 1 October 2010

अख्तर मियाँ

फरवरी की एक अलसाई दोपहर

हवा ग़ज़ल गुनगुना रही हैं, मैं कहीं ख्यालों की सैर पर निकला हुआ हूँ । अख्तर मियाँ आ धमकते हैं । इनका तार्रुफ़ इतना है कि ये शरीफ़ आवारा हैं । शेर हर वक़्त बगल में दबाये घूमते हैं और जो कहीं महफ़िल जम गयी तो साहब चिराग बन उसे रोशन कर देते हैं । 'अमाँ यार' उनका तकिया कलाम है । हाल-चाल पूँछने की इन्हें खास बीमारी है ।

आते ही बिस्तर पर काबिज़ हो जाते हैं ।
-"अमाँ यार" तुम तो ईद के चाँद हुए जा रहे हो । अम्मी तुम्हें याद कर रही थीं ।
-"ह्म्म्म" मैं होश में आता हूँ ।
-ये तो कोई जवाब नहीं हुआ । कहाँ खोये हुए हो ?
-गहरी साँस लेता हूँ ।
-अमाँ ये हो क्या रिया है ? जवानी कहाँ बर्बाद किये बैठे हो । माथे पर हाथ रखते हैं । तबियत तो दुरुस्त मालूम होती है । अब कुछ बकोगे भी या हम ही कुछ फ़रमायें ।
-मैं उनके चेहरे को बात टालने के उद्देश्य से देखता हूँ ।
-वो शेर कहते हैं :
मत पूँछ, कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख, कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे ।

"अब बताओगे भी कि माज़रा क्या है ?" शेर खत्म होते ही वार करते हैं ।

-कुछ नहीं है अख्तर, खामखाँ परेशान ना करो ।
-तो बात यहाँ तक पहुँच गयी । लौंडा बर्बाद हुआ जा रिया है, उनकी याद में । कौन है ? ज़रा हमें भी तो इत्तिला की होती । कुछ ना सही तो दो लफ्ज़ ही सुन लेते ।
-क्या, कौन है ? क्या बातें किये जा रहे हो ?
-वाह मेरे शेर, हम दुनियाँ को बनाते हैं और तुम हमें....खैर जाने दो, हम होते ही कौन हैं ?
-देखो अख्तर मियाँ, ये इमोशनली ब्लैकमेल मत किया करो ।
-तो बताओ, क्या माज़रा है ?
-कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं ।

वो थोड़े गुस्से में आकर झल्लाते हुए उठकर बैठ जाते हैं । इधर उधर निगाह दौडाते हैं । किताबों के दरमियाँ गुलाब बाहर झाँक रहा है । वो फटाक से उठकर वहाँ पहुँचते हैं । गुलाब हाथ में लेते हैं ।

-तो ज़नाब इश्क फरमा रहे हैं ।
-"ऐसा कुछ भी नहीं है" थोडा सकुचाते हुए कहता हूँ ।
-अमाँ तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोई चोरी कर रहे हो । अरे इश्क तो सभी करते हैं । शाहजहाँ ने किया था । अकबर ने किया था । हमारे अब्बू ने किया था । अरे हाँ अब्बू से याद आया । वैसे मामला कहाँ तक पहुँचा ?
-"क्यों, तुम्हारे अब्बू कहाँ से आ गये इसमें ?" मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ ।
-अब्बू तो नहीं आये, मगर हम जरुर आ गये ।
-ऐसा कुछ नहीं है यार ।

वो शेर कहते हैं :
तेरे वादे पे जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता ।

-देखो हमें नदीम ने सब बता दिया है ।
-"क्या बता दिया है ?" फिर से अंजान बनते हुए कहता हूँ ।
-यही कि तुम अंग्रेजी ट्यूशन के बहुत चक्कर लगा रहे हो । और जहाँ तक तुम्हारी अँग्रेजी का सवाल है, वो इतनी भी बुरी नहीं मालूम होती हमें ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-तो किला फतह कर लिया, मालूम होता है ।

कुर्ते की जेब से कागज़ निकालता हूँ । उन्हें पेश करता हूँ । वो लपक के पढने लगते हैं ।
-वाह, ख़त का दौर चल निकला और तुम अब बता रहे हो ।
-मैं बताने ही वाला था ।
-और अभी कुछ वक़्त पहले क्या हो रिया था ?
-अरे वो तो तुम्हें बना रहा था ।
-वाह मियाँ । पूरे आगरे में तुम्हें हम ही मिले हैं बनाने के लिए ।
-मैं मुस्कुरा देता हूँ ।

वो शेर कहते हैं :
इश्क पर जोर नहीं, है यह आतश ग़ालिब
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने ।

स्मृतियों में अख्तर मियाँ की बातें आज भी खुशबू फैलाती हैं । ना मालूम इन दिनों, किस शहर में होंगे अख्तर मियाँ....

8 comments:

richa said...

ये आपके अख्तर मियाँ चचा ग़ालिब के बड़े मुरीद लगते हैं... कभी मिलें तो हमारी तरफ़ से आदाब ज़रूर अर्ज़ करियेगा :)

monali said...

Akhtar Miyaan ka character aur sher dono kaafi interesting... Ab Anil ji ek hi baat kitni baar kahi jaye..hamesha ki tereh... 'LAjawaab'

कुश said...

क्या बात है मियां.. अख्तर मियां को पढके तो चश्मे बद्दूर के सईद जाफरी याद आ गए.. बहुत खूब लिखे हो बालक

सागर said...

अक्थर मियां जैसे लोग याद आने पर अपनी दिलचस्प शक्शियत से हमारे होंठों पर मुस्कराहट जरूर ला देते हैं... इनकी जीवन की सफलता इसी में है... जो हम उस वक्त टांग खींचे जाने के बायस समझ नहीं पाते... एक दौर में यह बड़े बुरी तरह से याद आते हैं... यह फ़कीर की तरह होते हैं.. जहाँ बैठे महफ़िल जमा di.

AVADH said...

अमां यार, अनिल आप तो छुपे रुस्तम निकले. खैर इश्क पर तो किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए. और इस पर किसी का बस भी नहीं.
"इश्क पर जोर नहीं, है यह वो आतिश ग़ालिब/
कि लगाये न लगे और बुझाये ना बने".
अवध लाल

mukti said...

बहुत सही ! किसी ज़माने में "अमां मियाँ" "अबे यार" ये सब हमारे भी तकिया कलाम हुआ करते थे, जब तक लखनऊ का असर था. अब तो हम पूरे पुरबिया हो गए हैं... अख्तर मियाँ टाइप लोग हर किसी की ज़िंदगी में होते हैं "शरीफ़ आवारा"

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

एक के बाद एक पढती जा रही हूं, और हर बार अनूप जी का धन्यवाद भी करती जा रही हूं, तहेदिल से, जिन्होंने मुझे यहां पहुंचाया.

 

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