Tuesday, 28 September 2010

सुकून

बीते हुए दिनों के अँधेरे जंगल से निकल, उजले वर्तमान का सुख सुकून नहीं देता । वो बंद पुराने बक्से में पड़ी जर्ज़र डायरी के सफहों में सुरक्षित अवश्य होगा । उसे छुआ जा सकता है किन्तु पाया नहीं जा सकता । वक़्त-बेवक्त सूखी स्याही को आँसुओं से गीला करना दिल को तसल्ली देना भर है । इससे ज्यादा और कुछ नहीं ।

तुम भी दो सौ गज की छत पर कपड़ों को सुखाकर, कौन सा सुकून हासिल कर लेती होगी । रात के अँधेरे में, बिस्तर की सलवटों के मध्य, थकी साँसों के अंत में क्षणिक सुख मिल सकता है । सुकून फिर भी कहीं नहीं दिखता । और फिर ये जान लेना कि मन को लम्बे समय तक बहलाया नहीं जा सकता । बीते वक़्त के सुखद लम्हों में तड़प की मात्रा ही बढ़ाता है । जानता हूँ उस पछताने से हासिल कुछ भी नहीं ।

वैज्ञानिक दावों को मानते हुए कि इंसान के जिंदा रहने के लिये साँसों को थकाना अति आवश्यक है की तर्ज़ पर भविष्य के साथी को भोगने से भी संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता । और फिर उसकी उम्मीदों पर खरा उतरते उतरते स्वंय के होने को बचाए रखना भी कम कलाकारी नहीं होगी । ये बात अलग है कि उस कला के लिये पुरस्कार वितरित नहीं होते । अन्यथा उस खेल के एक से एक बड़े खिलाड़ी संसार में मौजूद हैं । मैं तो कहीं ठहरता भी नहीं ।

एटीएम और क्रेडिट कार्ड पर खड़े समाज में ठहाकों के मध्य कभी तो तुम्हारा दिल रोने को करता होगा । दिखावे के उस संसार में क्या तुम्हारा दम नहीं घुटता होगा । चमकती सड़कों, रंगीन शामों और कीमती कपड़ों के मध्य कभी तो तुम्हें अपना गाँव याद आता होगा । कभी तो दिल करता होगा कच्चे आम के बाग़ में, एक अलसाई दोपहर बिताने के लिए । कभी तो स्मृतियों में एक चेहरा आकर बैचेन करता होगा ।

फिर भी अगर तुम्हें कहीं सुकून बहता दिखे, तो एक कतरा मेरे लिए भी सुरक्षित रखना । शायद कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए । वैसे भी, अभी भी कुछ उधार बनता है तुम पर ।

6 comments:

Udan Tashtari said...

शानदार......

monali said...

jin kahaaniyo ka sheershak SUKOON nahi tha, wo sukoon se bhar deti thi magar "उसकी उम्मीदों पर खरे उतरते उतरते स्वंय के होने को बचाए रखना भी कम कलाकारी नहीं होगी" jaisi lines sukoon churane wali hain...

richa said...

बड़ी अजीब सी बात है हर किसी को सुकून की तलाश है... पर सुकून किसी के पास नहीं... ये सुकून होता क्या है ? हम शायद किसी भी परिस्थिति में ख़ुश नहीं रहते और उससे भी बड़ी बात कभी संतुष्ट नहीं होते... जो भी होता है हमारे पास हमेशा उससे ज़्यादा ही चाहिये होता है... एक इच्छा पूरी नहीं होती की दूसरी इच्छा पहले से जाग जाती है... जिस दिन इन्सान अपनी इच्छाओं पर काबू पा लेगा उस दिन संतुष्ट भी हो जाएगा और उसे सुकून भी मिल जाएगा... पर शायद तब वो इन्सान नहीं रह जाएगा... भगवान बन जाएगा :)

कुश said...

ऐसे उधार कभी चुकाए नहीं जा सकते.. !! सुकून की तलाश में भागते हुए सुकून को ही खो देना.. ये कहाँ का न्याय है??

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर!

Unknown said...

सुकून न केवल ummeed hai balki har ek ki aas hai jo har kiSi ko chahiye... aas hai jo har kiSi ko chahiye...

 

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