Tuesday, 5 October 2010

सर्दियों की धूप में गाँव

दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत हैं । मटर के पौधे शर्मा कर झुक गये हैं । उधर गाजर लाल हुई जा रही है । सुबह की ओस मोती बनकर मेरे पैरों तले आकर अवर्णित सुख दे रही है । मैं चने के पौधे को तोड़ लेता हूँ । कच्चे चने खाने का सुख ले रहा हूँ । चाचू सीटी बजा रहे हैं । मैं कहता हूँ "चाचू मुझे भी सिखाओ ना" । वो कहते हैं "नहीं, गन्दी बात" । वो मेरे लिये फिर भी अच्छे बने रहते हैं । वो हर रोज़ यही बात कहकर टाल जाते हैं । और मैं इस हुनर को सीखना चाहता हूँ, सीटी बजाने का सुख भोगना चाहता हूँ । जब भी उदास हो या खुश तो सीटी गुनगुनाकर दिल बहला लो । कई दिन बीत गये हैं और उन्होंने मुझे अपना शिष्य बना लिया है ।

शाम का वक़्त है और गाँव अँधेरे में गुनगुना रहा है । हम सभी चचा-ताऊ के बच्चे मिटटी के चूल्हे को चारों ओर से घेरे बैठे हैं । माँ गरमा-गरम रोटियाँ बना रही है । कढाई से सब्जी थाली में निकाल कर, उसी में एक ओर रोटी रखकर खाने में आनंद आ रहा है । माँ बीच-बीच में टोक कर कहती है "थोड़ी ठंडी तो होने दे" । मैं फूली हुई रोटी को तोड़कर उसे फूँक-फूँक कर खा रहा हूँ । फिर सोचता हूँ कि माँ कभी-कभी तो बिना चिमटे के रोटी निकाल कर मुझे देती है । और देखो तो मेरी फ़िक्र कर रही है । तब लजीज़ शब्द से परिचित नहीं हूँ किन्तु ऐसा ही कोई शब्द माँ से कह देना चाहता हूँ, उसकी बनायीं हुई रोटियों और सब्जी के बारे में ।

शाम के आठ बजे हैं और गाँव की रात हो गयी है । बुजुर्ग लोग लकड़ियों और उपलों को एकत्रित कर उसमें आग लगाये, चारों ओर बैठे हैं । उनमें से कोई आल्हा-ऊदल को सुना रहा है । इन सबके मध्य में बैठा गर्माते-गर्माते सो गया हूँ और दादा जी बाद में कंधे पर टाँग मुझे खाट पर लिटा आये हैं । कुछ देर बाद माँ उठाकर ले गयी है । पुनः नींद के आगोश में जाने से पहले दूध और गुढ ख़त्म करना होगा । सुबह माँ से पूँछता हूँ "मैं दादा जी के पास से कैसे आया" । माँ कोई जवाब नहीं देती, बस मुस्कुराते हुए मट्ठा फेरने लगती है । मुझे मट्ठे में बाजरे की रोटी और गुढ मिलाकर खाना पसंद है । और माँ को मुझे दही खिलाना । हम दोनों खुश हैं ।

मेरे लिए लकड़ी की पट्टी आ गयी है । उसे हर सुबह घिस-घिस कर चमकाना होता है । खड्डी, दवात और कलम मेरे साथी बन चुके हैं । स्कूल में मास्टर जी लिखना सिखाते हैं । कलम से लिखने पर गीले को सुखाने के लिए धूप दिखा देता हूँ । अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः सीख चुका हूँ । इसके आगे क्या लिखा जाता है ? ये जानने के लिए उत्सुक हूँ किन्तु शेष बच्चे अभी उसी में अटके हैं । मैं पेड़ों पर बैठी चिड़िया को देखने में स्वंय को व्यस्त कर लेता हूँ ।

अबके पिताजी कई दिनों बाद आये हैं । मैं सीटी गुनगुनाना जान गया हूँ । पट्टी को चमकाने से लेकर सभी अक्षरों से परिचित हूँ । पिताजी ने माँ से अबके साथ चलने के लिए कहा है । माँ अपने और हम दोनों भाइयों के कपडे रख रही है । हम खेतों की पगडंडियों से होते हुए मुख्य सड़क तक पहुँच गये हैं ।

मैं बस की खिड़की से बाहर झाँक रहा हूँ । मटर, गाजर, मूली, शकरकंद और चने के खेत एक-एक कर पीछे छूटते जा रहे हैं । याद हो आता है पट्टी, कलम, दवात घर में ही छूट गये । पिताजी बता रहे हैं, अब तुम कॉपी पर लिखोगे । पेड़ों पर से आती धूप आँखों में चुभ रही है । माँ खिड़की बंद कर देती है । गाँव अब नहीं दिखता । बहुत कहीं पीछे छूट गया है.....

8 comments:

richa said...

गाँव का बेहद ख़ूबसूरत शब्द चित्रण... जाने क्या क्या याद दिला दिया :) पोस्ट पढ़ते-पढ़ते चने का साग भी खाया खेत से तोड़ के और माँ के हाथ की चूल्हे वाली सौंधी रोटी भी... जिसमें से बड़ी प्यारी धुएँ और माँ के प्यार की ख़ुशबू एक साथ आ रही थी... पैर तो ठंडी-ठंडी ओस से एकदम कपो गये हैं और अभी तक एकदम ठन्डे हैं :) एक कुल्हड़ में चाय भी मिल जाती चूल्हे वाली तो...
गाँव अब नहीं दिखता । बहुत कहीं पीछे छूट गया है..... बेहद मर्मस्पर्शी... पर इस मर्म को सही मायने में शायद वही समझ सकते हैं जिन्होंने गाँव का वो सुख उठाया है...

monali said...

Lovely post.. sach maa ko kehna to bhul hi jate hain hameshsa... laziz jaise shabd aa jate hain fir bhi unhe tab tak for granted lete hain jab tak mom made milna band nahi ho jata h...

कुश said...

जबरदस्त भाई जबरदस्त

mukti said...

बस, पट्टी पर लिखना छोड़ बाकी सारी यादें मेरी भी साझी हैं...शायद उन सभी की, जो गाँव या छोटे कसबे से आये हुए लोग हैं. सभी का गाँव कहीं पीछे छूट गया है, अब नज़र नहीं आता, पर दिल के एक कोने में गाँव अभी भी रहता है, सारी जिंदगी रहेगा और खेतों और गाँवों से जोड़े रखेगा.

shikha varshney said...

गाँव कभी देखा नहीं पर जैसा सुना है आपकी कहानी में वैसा ही पाया ...बहुत खूबसूरत.

Ritika Rastogi said...

gaanv ke is rang ko dekhne ka saubhagya to ab tak nahi mila, lekin aapki post ko padhkar ek ichchha zaroor jaag gayi hai.
ek bahut achchhi, masoom aur samajhdaar si post!

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

चमत्कृत हूं.

 

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