Saturday, 30 October 2010

फ़िक्शन

छतों पर चाँदनी पसर जाती । अन्ताक्षरी में दबी-छिपी आवाजें रह-रह कर खनक उठती थीं । कोई सुरीली लय, अपने बाद भी, अपने मीठे होने का एहसास कराती रहती । कही किसी कोने से खुसर-पुसर के फूल झड़ते, तो कहीं दो आँखें चारों दिशाओं में इठलाती फिरतीं । और उन सब के बीच, प्रतीक्षा की घडी की सुईयाँ, मन के कलेजे पर धाँय-धाँय कर रेंगतीं ।

उसके आते ही, अम्मा कहतीं "लो आ गई हमारी बेग़म अख्तर, अब देखते हैं हमें कौन हराता है । और फिर सब अपनी-अपनी मुस्तैदी दिखाते । बाज़ी कभी इधर तो कभी उधर । कभी ये पलड़ा भारी तो कभी वो । किन्तु अंततः जीतती बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु की अम्मा ही । और फिर अगले दिन तक उस बात का हो हल्ला रहता । कुछ चेहरे रूठे रहते तो कुछ कहते "हमें नहीं खेलना, यह मुआँ खेल" या "हमको अभी फुर्सत नहीं, जाओ कह दो अम्मा से" । और अम्मा एक दो दिन बाद सब का हाथ पकड़-पकड़ कर इकठ्ठा करतीं । फिर से वही दौर चल निकलता । हँसना, नाचना और गाना ।

उन्हीं दिनों गर्मियों की छुट्टियों में पहली दफा, उस छत पर एक नई आवाज़ गुनगुनाती है । रूठने वाले चेहरों को अपना मसीहा मिल गया और पहली दफा बेग़म अख्तर हार गयीं । हर रोज़ से ज्यादा शोर सुनाई देता है । चाँदनी में नहायी बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु का चेहरा रौशन हो रहा है । पहली ही मुलाकात और हम उन्हें खफ़ा कर बैठते हैं । अगले चार रोज़ तक वो छत के उस खेल में शामिल नहीं होतीं । हाँ दोपहर की रौशनी में जब तब उनकी और हमारी आँखें टकरा जाती हैं । मालूम होता है, बच्चू तुम तो गए काम से । खुद अपना ही क़त्ल करने की तबियत लिए बैठे हो ।

चार रोज़ बाद उनके ओठों पर मुस्कराहट लौट आती है । छत का मौसम सुधर जाता है । अब चाँदनी अच्छी नहीं लगती । अँधेरे में एक हाथ पर दूसरा हाथ रह-रह कर आता है । शुरू-शुरू में वो अपना हाथ झटक देती है । और फिर एक-दो रोज़ में उनकी आँखों में में शरारत बढ़ गई है । वो अँधेरे का फायदा उठा चिकोटी काट लेती हैं । हम आह, आउच की आवाजें निकालते हैं । कुछ आवाजें खी-खी कर उठती हैं । अम्मा कहती हैं "क्या हुआ ?" । हम टालते हैं कि मच्छर काट रहा है ।

वो दोपहार को छत पर कपडे पसारने आई है । मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ । वो कह रही है "हमारा हाथ छोडो" । हम प्रत्युत्तर में कहते हैं "अगर नहीं छोड़ा तो" । तो "अम्मा...." । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ । "बस डर गए" कहती हुई, खिलखिलाकर चली जाती है ।

अँधेरा घिर आया है । छत पर महफ़िल जमी है । अम्मा आवाज़ देकर उसे बुला रही हैं । नीचे से आवाज़ आ रही है "आ रहे हैं" । सीढ़ियों पर मैं खड़ा हूँ । हमारा आमना-सामना हुआ है । वो आगे को बढ़ने लगती है । हम हाथ पकड़ लेते हैं । वो कुछ नहीं कहती । हम पास खींच लेते हैं । और उसके कानों के पास जाकर कहते हैं "आवाज़ दो फिर भी नहीं छोड़ेंगे" । वो मुस्कुरा उठती है ।

अम्मा की फिर से आवाज़ आ रही है । दो सुरीले ओठ आपस में मोहब्बत कर रहे हैं । जंग बहुत पीछे छूट गई है ।
मन में ख़याल हो उठता है "अम्मा तुम्हारी बेग़म अख्तर तो अब हमारी हुईं"....

12 comments:

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

beautiful!

mukti said...

ओहो ! बेहद रोमैंटिक.

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (1/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

richa said...

प्यार की चाशनी में सराबोर बड़ी मीठी सी कहानी :) पर कहानी का नाम फ़िक्शन क्यूँ रखा ?

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!

अनुपमा पाठक said...

lovely fiction!

कुश said...

जियो रज्जा

वन्दना अवस्थी दुबे said...

@मालूम होता है, बच्चू तुम तो गए काम से । खुद अपना ही क़त्ल करने की तबियत लिए बैठे हो ।
@मन में ख़याल हो उठता है "अम्मा तुम्हारी बेग़म अख्तर तो अब हमारी हुईं"....
कमाल है... अब तक कहां थे हम??? जिसने लिंक दिया, उसे भी मोती ढूंढने का शौक सा है...

अल्पना वर्मा said...

बहुत खूब ..

...............
आकर्षक ब्लॉग टेम्पलेट .
लेखक का नाम अता पता परिचय कुछ नहीं ?
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इस्मत ज़ैदी said...

ab tak ki saaree posts padh lee hain main ne ,yeto maaloom nahin ki ye sirf kahaaniyan hain ya haqeeqat ,
lekin lekhan itanaa bhavpoorn hai ki ye soch ubhar aatee hai ________

"is men fasaanaa kam hai haqeeqat ziyaadaa hai"

अपूर्ण said...

खूबसूरत फ़साना , उस पर ऐसी दिलकश कलम...उफ़... मुहब्बत शायद इसी का नाम है

निठल्ला said...

"अम्मा...." । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ

क्या बात है अनिल, यहाँ तो फिक्शन भी करेंट मारता है

 

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