Thursday, 11 November 2010

उन "वैलेंटाइन डे" वाले दिनों में

सर्दियों की गुनगुनी धूप है मैं आँगन में कुर्सी-मेज़ डाले, कैमिस्ट्री की किताब से तमाम गैसों को एक-एक कर के उड़ते देख रहा हूँ रह-रह कर एहसास होता है कि उनकी गंध, मेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गयी है भरोसा हो उठा है कि जाकर परीक्षा में उड़ेल दूँगा

भीतर से माँ आवाज़ देती है "दुकान से 100 ग्राम हींग ले आओ"
-"मैं अभी पढ़ रहा हूँ, बाद में लेकर आऊँगा" मैं तेज़ आवाज़ में कहता हूँ

माँ कुछ नहीं कहती इन दिनों आने वाली बोर्ड परीक्षा के कारण, कोई मुझसे कुछ नहीं कहता जब-तब मेरा एक ही उत्तर होता है "पढ़ रहा हूँ" और सामने वाला उत्तर को टटोलता नहीं, कि सही है या गलत

एक कंकड़ मेरे पास आकर गिरा है किताब में से सिर को उठाकर देखता हूँ वो देखकर मुस्कुरा रही है वो अपनी तीसरी मंजिल की छत पर, हर सुबह टंकी में पानी देखने के बहाने से आती है और हर रोज़ वह यही करती है मन ही मन सोचता हूँ कि उसके फैंके गये कंकडों का संग्रह कर लूँ और उसे किसी रोज़ उपहार में दूँ उसे देते हुए कहूँ "ये देखो तुम्हारे फैंक कर मारे गये फूल" और फिर प्रत्युत्तर में उसका खिलखिलाकर हँसना देखूँ

माँ पिछले कई रोज़ से, उसे अपनी छत से, हमारे आँगन में निहारते हुए देख रही है अभी आँगन में निकल कर आएँगी और कल रोज़ की तरह ही, मुझसे पूँछेंगी "यह लड़की हमारे आँगन की ओर ही क्यों देखती रहती है ?" और मैं प्रत्युत्तर में कहूँगा "मैं क्या जानू ? खुद ही जाकर पूँछ लो ना "

हालांकि उसकी भी बोर्ड परीक्षाएं हैं किन्तु ना जाने क्यों, वह हर रोज़ कंकड़ फैंकने जाती है उसकी माँ अवश्य ही उससे प्रश्न करती होगी "तुझे हर रोज़ पानी की इतनी चिंता क्यों रहती है ?" और वह भी कोई समझदारी वाला उत्तर देती होगी

हम कितने नासमझ थे, जो स्वंय के समझदार होने पर गर्व करते थे

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मैं प्रतिदिन सुबह चार बजे उठ जाता हूँ, प्रारम्भ में अपनी पढाई के कारण और कुछ महीनों बाद उसके कारण वो हर रोज़ पाँच बजे अंग्रेजी का ट्यूशन पढने जाती है और मैं उसे अपनी खुली खिड़की से निहारता हूँ वो एक चोर नज़र से मुझे देखती है और फिर साइकिल के पैडल को देखने लगती है खिड़की पार कर लेने पर, पैडल उसके पाँव का स्पर्श कर पाते हैं

इस पूरे बरस मैं हर हाल में पाँच बजे से पूर्व जागा हूँ पिताजी मेरी इस आदत से खुश हैं और मैं उसकी आदत से माँ मुझे हर रोज़ सही समय पर जगाकर, मेरी सुबह खुशनुमा बना देती है कभी-कभी उसे देखकर, माँ की शक़ की सुई बहुत तेज़ी से घूमने लगती है

उस रोज़ जब मैं खिड़की खोलकर पढ़ रहा था और माँ ने उसे निकलते देख, उससे पूँछा था "किस क्लास में पढ़ती हो ? " उसका गला सूखा हो या ना सूखा हो मैं अवश्य सूख गया था उसके चले जाने पर माँ ने मेरी ओर प्रश्नात्मक निगाहों से देखा था और मैं उत्तरविहीन, अपनी गणित की किताब में उलझा होना जता रहा था

सोचता हूँ कि यदि माँ को बोर्ड परीक्षक बना दिया जाए, तो वे अवश्य ही मेरे हर प्रश्नपत्र में इन्हीं प्रश्नों को रखेंगीं और मेरा रोल नंबर अखबार के किसी भी पन्ने पर नहीं दिखेगा

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मार्च अभी दूर है और बोर्ड के मौसम पर बसंत भारी है लाल-गुलाबी कार्डों की बहार है ख़याल हो आता है कि माँ से कोई बहाना कर कार्ड खरीदने के लिये पैसे माँग लूँ, किन्तु उनके प्रश्न दिन--दिन कठिन होते जा रहे हैं और उसके कंकडों की संख्या अधिक

रात्रि के स्वप्न में संग्रहालय देखा है, जिसमें केवल, उसके कंकड़ और माँ के प्रश्न ही हैं मैं पंक्तिबद्ध होकर उनको देख-सुन मुस्कुरा उठता हूँ बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा है, जिसमें रह-रह कर आवाजें गूँजती है "मैं पढ़ रहा हूँ "

सुबह उठकर, पास के पार्क से, एक गुलाब तोड़ लाया हूँ खिड़की से आती हवा, कानों में रूमानी संगीत बजा रही है साइकिल के चले आने की आवाज़ दूर कहीं से कानों में पहुँचती है दिल ज़ोरों से धड़कने लगा है वो खिड़की के पास पहुँचती जा रही है मैं चुपके से दरवाज़ा खोल बाहर गया हूँ मैं उसके सामने जा खड़ा होता हूँ उसके कदम थम गये हैं मध्य में लम्बी चुप्पी छा गयी है मैं पीठ के पीछे छुपे हाथ को आगे बढाता हूँ वो गुलाब ले, साइकिल के पैडल घुमाती, चुप से चली जाती है

इस बरस भी मैं उससे कुछ ना कह सका......

12 comments:

रंजन said...

बहुत सुन्दर.. मजा आ गया...

अपूर्ण said...

एक लिमिट के बाद तो कहानियां के सारे रस और भाव भी सूख जाते हैं यार...

तुम कैसे रूमानी ख्यालों पर हर बार कुछ ऐसा लिख देते हो , जहाँ पर लगता है कि अब शायद कुछ इससे अच्छा नहीं लिख सकते| लेकिन , तुम तैयार रहते हो हर बार ,एक नयी पोस्ट के साथ चौंकाने के लिए|

खूबसूरत.. बेहद खूबसूरत अहसास| दिल से खूबसूरत इंसान ही ऐसा लिख सकता है|

संजय भास्कर said...

बेहद खूबसूरत अहसास

monali said...

Lovely... ye maa waise bilkul chalaak nahi hoti magar bachcho ki baari aate hi na jane kaun se senses jagrit ho jate hain.. :)

सागर said...

फ्लेश बेक में जा कर अब कह दो यार सिर्फ उतना नहीं जितना तब कहना चाहते थे मतलब दिमाग अभी का हो और माहौल तब का. क्या ख्याल है ?

shikha varshney said...

wowww Splendid.

anjule shyam said...

यादों कि बारात निकली है यारों ...................फ्लैस बैक में जिन्दगी कुछ ज्यादे ही खुबशुरत दिखती है...........

richa said...

beautifully woven emotions as always...
सागर की बात से सहमत हूँ... जितने कंकड़ बटोरें थे उन दिनों एक दिन फ्लैशबैक में जा के उतने फूल दे आओ... उनकी ख़ुशबू से आज भी महक उठेगा :)

रचना दीक्षित said...

ये सब क्या चल रहा है ???? पढाई क्यों नहीं करते ढंग से????? आज के ज़माने घर बहुत महंगे हैं. कंकड़ आने दो, जमा कर लो, कमसे कम एक कमरे की छत ही पड़ जायगी.हा हा हा .....

कुश said...

रूमानियत बिखेर दी प्यारे

PD said...

‎"हम कितने नासमझ थे, जो स्वंय के समझदार होने पर गर्व करते थे ।" आज से दस साल बाद आज के दिनों को भी इन्ही शब्दों कि जरूरत पड़ेगी.. देख लेना..

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

लिल्लाह!
आशीष
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पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

 

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