Tuesday, 28 December 2010

छत पर उतरती जून की रातें

वे तपती जून के दिन हुआ करते . एकदम थके और बेजान . उन आखिरी दिनों के एक ओर सुलगती दोपहरें हुआ करतीं और दूसरी ओर जुलाई . इनके बीच कूलर एक स्वप्न सा जान पड़ता . जोकि माँ द्वारा बचाई जमा पूँजी और पिताजी के प्लान के बावजूद टलता जाता . हम सीमेंटेड फर्श पर तकिया लगाए छत को ताका करते . और गर्म हवा फैंकते पंखे से चिढ होने लगती .

हम हर दोपहर शाम घिर आने की प्रतीक्षा करते . जब सूरज सुस्ताने चला जायेगा और चाँद उसे मुँह चिढाता सा अपनी ड्यूटी की राह में होगा . बच्चे अपने घरों की देहरी को लाँघते हुए बाहर मैदान में चहकेंगे . कुछ क्रिकेट के लिए टीम बाँटते दिखेंगे, कुछ कंचा-गोली में तल्लीन हो जायेंगे . लड़कियाँ या तो माँ का हाथ बँटा रही होंगी या बैडमिन्टन खेलती दिख जायेंगी . और देखते ही देखते शाम डूबने लगेगी . अँधेरा छतों पर पसर जाएगा और चारों ओर पीले बल्ब टिमटिमाने लगेंगे .

फिर रात छतों और आँगनों में उतर आएगीबत्ती गुल हो जायेगी और आस-पास के घर अँधेरे में दुबक जायेंगेलोग अपनी-अपनी मच्छरदानियाँ तानना प्रारंभ कर देंगेछतों पर बिस्तर लगने लगेंगे और वो पड़ोस की छत को लाँघकर हमारी छत पर जायेगीहम मौन कई क्षणों तक आकाश में चमकते तारों को देखते रहेंगेऔर वो एकाएक कहेगी "तुमने कुछ कहा" और मैं कहूँगा "नहीं तो" ।
-तो कुछ कहो ना
-क्या ?
-कुछ भी, कुछ झूठा-कुछ सच्चा
-तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं झूठ कह रहा हूँ या सच ?
-तुम्हारे शब्दों के स्वर सब कह देते है
-अच्छा
-हाँ
-अच्छा तो बताओ, कि टूटते तारे के बारे में तुम झूठ मानती हो या सच

अँधेरे में वो मुस्कुरा देगी और मुझे ज्ञात हो जाएगा कि वह मुस्कुरायी होगीमैं पुनः उससे कहूँगा-बोलो ना
-क्या ?
-वही जो अभी मैंने पूँछा ?
-"झूठा सच" वो ऐसा कहकर गहरी साँस लेगी
-वो भला क्यों ?
-ऐसा झूठ जिसके सच हो जाने के सब ख्व़ाब बुनते हैं और इस उम्मीद में खुश रहते हैं कि शायद यह कभी सच हो जाए
-मैं मुस्कुरा दूँगा और जानता हूँ कि उसे पता चल जाएगा कि मैं मुस्कुराया हूँ


एक उम्र तक हम कितनी समझदारी की बातें करते हैंफिर दूसरी उम्र पर आकर उनके आदी होने लगते हैं जो जैसी हैंऔर हमें इस बात का एहसास भी नहीं रहता कि हमें उनकी आदत हो चली है

9 comments:

सागर said...

अंतिम लकीर सही है... हमेशा की तरह

वन्दना said...

यही सच है।

PD said...

और वो उम्र गुजर जाने के बाद वही समझदारी की बातें बेवकूफी सी लगने लगती है.. किसी झूठे-सच की तरह.

richa said...

अनिल जी ये समझदारी की बात तो सही कही आपने पर वो कहते हैं ना
धरती बनना बहुत सरल है कठिन है बादल हो जाना
संजीदा होने में क्या है मुश्किल है पागल हो जाना


तो ये समझदारी की बातें आप अपने दूसरे ब्लॉग पर किया करें :) ... यहाँ तो वो ही हल्की फुल्की, रूमानी सी, मोहब्बत की चाशनी में डूबी, फंतासी के बादलों पे तैरती, सर्दियों की दोपहर सी पोस्ट्स का ही इंतज़ार रहता है हमें... ज़रा अपने पाठकों का भी ख़्याल रखें सर जी... :)

डिम्पल मल्होत्रा said...

अँधेरे में वो मुस्कुरा देगी और मुझे ज्ञात हो जाएगा कि वह मुस्कुरायी होगी ।:-)

वन्दना said...

आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (3-1-20211) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.uchcharan.com

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । "खबरों की दुनियाँ"

फ़िरदौस ख़ान said...

सार्थक...
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही सुंदर............
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए...
*काव्य- कल्पना*:- दर्पण से परिचय
*गद्य-सर्जना*:-जीवन की परिभाषा…..( आत्मदर्शन)

 

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