Friday, 31 December 2010

अभूले दिन, अभूले चेहरे

उन नीम के झरते हुए पीले पत्तों और उतरकर गाढे होते हुए अँधेरे के बीच चलती हुई बातें बहुत दूर तक चली गयी थीं । हम अपने अपने क़दमों की आहटों से अन्जान बहुत दूर निकल गये थे । तब उसने यूँ ही एकपल ठहरते हुए कहा था ....

-यह नीम की ही पत्तियाँ झड रही हैं न...
-हाँ, शायद पतझड़ का मौसम है ।
-नहीं ये अँधेरे का मौसम है...लगता है अँधेरा हौले हौले झड़ता हुआ गहरा रहा है ।

तब वो एकपल के लिये मद्धम से मुस्कुरा दी थी...फिर उसने कहा

-कितना अच्छा हो कि हम न कुछ पूँछे और न जाने...अपनी अपनी जिंदगी के जवाब एक दूसरे से न माँगें । दिमाग को इसमें शामिल न करें और उसे जी लें जिसे ये दिल जीना चाहता है ।

तब वो ढेर सारे उसके बाद के खामोश पल कब और कैसे गुजर गये....कहाँ पता चला था
वक़्त जब पहलू बदलता है तो खामोश सा चुपचाप गुजर जाता है ।

तब रात चाँदनी थी । हवा गुनगुनाती सी कानों को छूकर जा रही थी । दिल की आहटें दूजे के दिल तक अपना सन्देश गुपचुप पहुंचा रही थीं ।

तब मैंने उससे कहा था
-लगता है आज पूरे चाँद की रात है !
-नहीं, आज चाँद कुछ अधूरा सा जान पड़ता है...कल पूरे चाँद की रात होगी !
उसकी इस बात पर चाँद उतरकर उसके गुलाबी गाल को थपथपा कर चल दिया था । मैंने मुस्कुराते हुए उस चाँद को जाते देखा...

उसने यूँ ही आहिस्ता से चाँद को जाते देखकर पूँछा
-आपको सपने देखना पसंद है...
-हाँ, बहुत...शायद मुझे उससे ज्यादा पसंद है, सपनों को जमा करना...रंग बिरंगे सपने, खूबसूरत सपने, अपनों के सपने, अपने सपने
-सच !
-हम्म्म्म....मैंने ठंडी साँस भरकर कहा
-क्योंकि जमा किये सपने याद बन जाते हैं और उन सुनहरी जमा यादों को मैं अक्सर थपथपा कर उनका हाल पूँछता हूँ । उन यादों में वो सपने बिलकुल अपने लगते हैं ।

यह कहते हुए मैं खामोश सा हो चला था । वो उस पल बोली थी...
-यादें पवित्र होती हैं...शायद इसी लिये जमा रह जाती हैं

-तब उन गहरी हो सकने वाली यादों को, जिनकी आहटें भी रूहानी संगीत छेड़ती हैं, संवारने के लिये हम एक सफ़र पर चल दिये थे...

उस खामोश फैली हुई चाँदनी में उसके ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और काँपे थे और उसकी पलकें सीपियों की तरह मुंद गयीं थीं...जिस पल दोनों के ओठों के स्पर्श ने उस यादगार गहराए हुए पल को एक खुशनुमा न भूलने वाली याद बना लिया था । खुलती और बंद होती सीपियों का वह संसार एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

Tuesday, 28 December 2010

छत पर उतरती जून की रातें

वे तपती जून के दिन हुआ करते . एकदम थके और बेजान . उन आखिरी दिनों के एक ओर सुलगती दोपहरें हुआ करतीं और दूसरी ओर जुलाई . इनके बीच कूलर एक स्वप्न सा जान पड़ता . जोकि माँ द्वारा बचाई जमा पूँजी और पिताजी के प्लान के बावजूद टलता जाता . हम सीमेंटेड फर्श पर तकिया लगाए छत को ताका करते . और गर्म हवा फैंकते पंखे से चिढ होने लगती .

हम हर दोपहर शाम घिर आने की प्रतीक्षा करते . जब सूरज सुस्ताने चला जायेगा और चाँद उसे मुँह चिढाता सा अपनी ड्यूटी की राह में होगा . बच्चे अपने घरों की देहरी को लाँघते हुए बाहर मैदान में चहकेंगे . कुछ क्रिकेट के लिए टीम बाँटते दिखेंगे, कुछ कंचा-गोली में तल्लीन हो जायेंगे . लड़कियाँ या तो माँ का हाथ बँटा रही होंगी या बैडमिन्टन खेलती दिख जायेंगी . और देखते ही देखते शाम डूबने लगेगी . अँधेरा छतों पर पसर जाएगा और चारों ओर पीले बल्ब टिमटिमाने लगेंगे .

फिर रात छतों और आँगनों में उतर आएगीबत्ती गुल हो जायेगी और आस-पास के घर अँधेरे में दुबक जायेंगेलोग अपनी-अपनी मच्छरदानियाँ तानना प्रारंभ कर देंगेछतों पर बिस्तर लगने लगेंगे और वो पड़ोस की छत को लाँघकर हमारी छत पर जायेगीहम मौन कई क्षणों तक आकाश में चमकते तारों को देखते रहेंगेऔर वो एकाएक कहेगी "तुमने कुछ कहा" और मैं कहूँगा "नहीं तो" ।
-तो कुछ कहो ना
-क्या ?
-कुछ भी, कुछ झूठा-कुछ सच्चा
-तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं झूठ कह रहा हूँ या सच ?
-तुम्हारे शब्दों के स्वर सब कह देते है
-अच्छा
-हाँ
-अच्छा तो बताओ, कि टूटते तारे के बारे में तुम झूठ मानती हो या सच

अँधेरे में वो मुस्कुरा देगी और मुझे ज्ञात हो जाएगा कि वह मुस्कुरायी होगीमैं पुनः उससे कहूँगा-बोलो ना
-क्या ?
-वही जो अभी मैंने पूँछा ?
-"झूठा सच" वो ऐसा कहकर गहरी साँस लेगी
-वो भला क्यों ?
-ऐसा झूठ जिसके सच हो जाने के सब ख्व़ाब बुनते हैं और इस उम्मीद में खुश रहते हैं कि शायद यह कभी सच हो जाए
-मैं मुस्कुरा दूँगा और जानता हूँ कि उसे पता चल जाएगा कि मैं मुस्कुराया हूँ


एक उम्र तक हम कितनी समझदारी की बातें करते हैंफिर दूसरी उम्र पर आकर उनके आदी होने लगते हैं जो जैसी हैंऔर हमें इस बात का एहसास भी नहीं रहता कि हमें उनकी आदत हो चली है

Saturday, 20 November 2010

उस दफा, उसके जन्मदिन पर

रात की स्तब्धता में घडी की सुइयों का टिकटिकाना ज़ोरों पर है । पिताजी उर्फ़ डैडी फ़ोन वाले कमरे में चहलकदमी कर रहे हैं । और आपके मन का मयूर बार-बार उसी फ़ोन के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है । वे सोच की मुद्रा में अपनी सिगरेट जला लेते हैं . आप जानते हैं कि कम-से-कम सिगरेट के समाप्त होने तक तो वे उसी कमरे में टहलते रहेंगे . और आपको अब अगले पाँच मिनट तक स्वंय को पढाई में तल्लीन जताना होगा .

सिगरेट बुझ गयी है और पिताजी अपने क़दमों के पीछे धुएं के छल्ले छोड़ गए हैं . जैसे वे उनके बाद के पहरेदार हों, किन्तु पहरेदार अपने मालिक के चले जाने पर, कभी ना समाप्त होने वाली, नींद के आगोश में चले जाते हैं .

आप दबे क़दमों से उठते हैं और कमरे में पहुँचते हैं, रिसीवर कानों पर, उंगलियाँ काले बटनों पर और दूसरी और दूर-लम्बे तक जाती घंटी टन-टना रही है . मन की सतह पर भय पसरा हुआ है कि उस और रिसीवर कौन उठाएगा . और उसके पिता की कड़क आवाज़, आपके कानों के परदे फाड़ देने को आतुर है . आप एक भी शब्द कहे बिना रिसीवर पटक देते हैं और उसके पिता को कोसते हैं, यह सोचे बिना कि जो वे न होते तो उनकी खूबसूरत पुत्री उर्फ़ आपकी महबूबा कैसे होती .

आप पुनः नंबर डायल करते हैं, हालांकि आप चाहें तो री-डायल का बटन भी दबा सकते हैं किन्तु आप अपनी काँपती अँगुलियों से भय को दूर छिटक देना चाहते हैं . इस दफा उसकी बहन माँ ने रिसीवर उठाया है . और आपसे कुछ कहते नहीं बन रहा . आपका गला सूख जाता है और शब्द बाहर आने को तरसते हैं किन्तु आप उन्हें पीछे धकेलते हैं और रिसीवर रख देते हैं . आपने उसकी माँ को फ़ोन रखते हुए सुना है कि "कितनी बार कहा है कि कॉलर-आईडी लगवा लीजिए, लेकिन मेरी सुने तब ना" .

और इन सबके मध्य कि आप उनकी सुशील, खूबसूरत, गृह कार्य दक्ष पुत्री और आपकी महबूबा कम गर्ल फ्रैंड को यह नहीं बता पाए कि कल आप उसके शहर में होंगे, क्योंकि आप उसका जन्मदिन किसी भी तरह मनाना चाहते हैं .

क्योंकि तीसरी दफा रिसीवर उठने पर, उनके पिताजी उर्फ़ आपके भविष्य के ससुर, आपको ब्लडी ईडियट की उपाधि दे देते हैं .

आप स्कूल की और से जाने वाले कैम्प का कह और अपने को बुद्धिमान लड़कों की सूची में डालकर, अपनी माँ के भोलेपन का फायदा उठाते हैं और चलते समय उनसे 500 रुपये भी ले लेते हैं . उन्हें इस बात का ज़रा भी संदेह नहीं कि यह उनकी भविष्य की हो सकने वाली पुत्र वधू पर खर्च होने जा रहे हैं .

भोर की सर्द हवा आपके शरीर में सुइयाँ चुभो रही है . आप काँप रहे हैं, दाँत कट-कटा रहे हैं किन्तु हीरो-गीरी के चक्कर में बिना स्वेटर के चले आये हैं . जैसे कि उसके शहर में आप गुनगुनी धूप में, अपने सिर को उसकी गोद में रख, लेटे-लेटे धूप सकेंगे . और आपके आस-पास के सभी पशु-पक्षी आपके प्रेम-प्रदर्शन से लजा जायेंगे .

आप छूट चुकी ट्रेन को दौड़ते हुए पकड़ते हैं और गिरते-गिरते बचते हैं . फिर आप ट्रेन के सही समय पर आ जाने पर, रेलवे विभाग को मन ही मन गाली देते हैं . आप डिब्बे की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे महबूबा से मिलने के तमाम एंगल सोच-सोच कर तीन घंटे बिता देते हैं .

उसके शहर का रेलवे स्टेशन देख कर आपको उस पर बहुत प्यार आता है . आप इस पर भविष्य में कई-कई बार उतरना चाहते हैं . पहले अकेले, फिर उसकी बाँहों में बाहें डाले, फिर अपने एक बच्चे को गोद में लिए जब वोह उंगली दिखाकर पूंछ रहा है कि डैडी देखो वो एरोप्लेन . और आप उसकी नज़रों से एरोप्लेन को उड़ते हुए देख रहे हैं . और आपकी गर्ल फ्रैंड कम भविष्य की पत्नी आप दोनों को डांटते हुए आगे बढ़ने को कह रही है . आप एक ही क्षण में भविष्य के ढेर सारे स्वप्न देख लेते हैं .

उसका शहर सुबह की आँख खोल रहा है . अंगडाई लेते हुए कह रहा है "चैन नहीं है, अरे तुम्हारी महबूबा का जन्म-दिन है तो क्या सारा शहर, सर पर उठा लोगे" . आप कचौड़ी और जलेबी की खुशबू लेते हुए, बच्चों की पीठ पर बस्ता लड़ा देखते हुए, मोटी-मोटी औरतों को टहलकर वजन घटाने का भ्रम पाले हुए देखते हैं .

आप सुबह-सुबह उसके कॉलेज के गेट पर खड़े हो जाते हो और चौकीदार आपको तीन दफा लताड़ चुका है . और चौथी दफा आप उसे सिगरेट पिलाते हुए दोस्ती कर लेते हो . वो आपको अपने गाँव की तमाम कहानियां सुना चुका है किन्तु आप उसे फिर भी यह जाता रहे हो कि आप बिलकुल भी बोर नहीं हुए . आपको उसकी कहानियों में बहुत इंटरेस्ट आ रहा है . वह उत्साहित सुर में न जाने क्या क्या गाये जा रहा है . आपका मन कर रहा है कि आप उसके कान पर दो धरें और कहें कि उसे और कोई काम नहीं सिवाए मेरी जान खाने के . अरे चार सिगरेट पी चुके हो, जाओ अपना काम करो .

आपको प्रतीक्षा की घड़ियाँ सदियों लम्बी लगने लगती हैं और वह प्रतिदिन की अपेक्षा अधिक देर से आई है . आपको देख कर वह अपना नाराज़ होना जताती है कि आपसे एक फ़ोन भी नहीं किया गया . देखो तो रात के बखत कितने तो लोगों के बधाई सन्देश आये . और एक तुम हो कि सोने से फुर्सत हो तब न . आप अब उसे मनाएंगे ये जानते हुए कि आपने कोई गलती नहीं की . वह आपकी कोई बात नहीं सुनेगी लम्बे समय तक . और फिर बहुत देर तक आपके मनाने पर वह मान जाएगी . आप उसको लेकर सिनेमा हॉल की दबी-छुपी सीटों पर बैठे खुसर-पुसर कर रहे हैं . आपके कई प्रयत्नों पर आपके ओंठ उसके ओंठों का स्पर्श करते हैं . और उसके कानों में, सुरीली लय में "आई लव यू" कहते हैं . वह प्रत्युत्तर में आपके गलों को चूम लेती है .

माँ का दिया 500 का नोट और अपना बचाया 500 का नोट आपने कई तरह से खर्च किया है . शाम घिर आई है और वह अपनी देरी होने की बात छेड़ देती है . आप उसे कुछ देर और रुकने का निवेदन करते हैं . कुछ क्षण तक आप उसकी आँखों में स्वंय के लिए प्यार को घुले हुए देखते हैं . आप इस मुलाकात की विदाई पर अंतिम बार गले मिलते हैं . वह आई लव यू कहती हुई जा रही है . आप खड़े-खड़े उसे तब तक देखते रहते हैं, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो जाती . वह अब कहीं नहीं दिखती .

उसके जाने के बाद भी, उसकी महक आपके रोम-रोम में महक रही है . आप गहरी साँस लेते हैं और मन ही मन मुस्कुराते हैं . मुस्कान आपके ओठों पर बिखर गयी है ......




Thursday, 11 November 2010

उन "वैलेंटाइन डे" वाले दिनों में

सर्दियों की गुनगुनी धूप है मैं आँगन में कुर्सी-मेज़ डाले, कैमिस्ट्री की किताब से तमाम गैसों को एक-एक कर के उड़ते देख रहा हूँ रह-रह कर एहसास होता है कि उनकी गंध, मेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गयी है भरोसा हो उठा है कि जाकर परीक्षा में उड़ेल दूँगा

भीतर से माँ आवाज़ देती है "दुकान से 100 ग्राम हींग ले आओ"
-"मैं अभी पढ़ रहा हूँ, बाद में लेकर आऊँगा" मैं तेज़ आवाज़ में कहता हूँ

माँ कुछ नहीं कहती इन दिनों आने वाली बोर्ड परीक्षा के कारण, कोई मुझसे कुछ नहीं कहता जब-तब मेरा एक ही उत्तर होता है "पढ़ रहा हूँ" और सामने वाला उत्तर को टटोलता नहीं, कि सही है या गलत

एक कंकड़ मेरे पास आकर गिरा है किताब में से सिर को उठाकर देखता हूँ वो देखकर मुस्कुरा रही है वो अपनी तीसरी मंजिल की छत पर, हर सुबह टंकी में पानी देखने के बहाने से आती है और हर रोज़ वह यही करती है मन ही मन सोचता हूँ कि उसके फैंके गये कंकडों का संग्रह कर लूँ और उसे किसी रोज़ उपहार में दूँ उसे देते हुए कहूँ "ये देखो तुम्हारे फैंक कर मारे गये फूल" और फिर प्रत्युत्तर में उसका खिलखिलाकर हँसना देखूँ

माँ पिछले कई रोज़ से, उसे अपनी छत से, हमारे आँगन में निहारते हुए देख रही है अभी आँगन में निकल कर आएँगी और कल रोज़ की तरह ही, मुझसे पूँछेंगी "यह लड़की हमारे आँगन की ओर ही क्यों देखती रहती है ?" और मैं प्रत्युत्तर में कहूँगा "मैं क्या जानू ? खुद ही जाकर पूँछ लो ना "

हालांकि उसकी भी बोर्ड परीक्षाएं हैं किन्तु ना जाने क्यों, वह हर रोज़ कंकड़ फैंकने जाती है उसकी माँ अवश्य ही उससे प्रश्न करती होगी "तुझे हर रोज़ पानी की इतनी चिंता क्यों रहती है ?" और वह भी कोई समझदारी वाला उत्तर देती होगी

हम कितने नासमझ थे, जो स्वंय के समझदार होने पर गर्व करते थे

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मैं प्रतिदिन सुबह चार बजे उठ जाता हूँ, प्रारम्भ में अपनी पढाई के कारण और कुछ महीनों बाद उसके कारण वो हर रोज़ पाँच बजे अंग्रेजी का ट्यूशन पढने जाती है और मैं उसे अपनी खुली खिड़की से निहारता हूँ वो एक चोर नज़र से मुझे देखती है और फिर साइकिल के पैडल को देखने लगती है खिड़की पार कर लेने पर, पैडल उसके पाँव का स्पर्श कर पाते हैं

इस पूरे बरस मैं हर हाल में पाँच बजे से पूर्व जागा हूँ पिताजी मेरी इस आदत से खुश हैं और मैं उसकी आदत से माँ मुझे हर रोज़ सही समय पर जगाकर, मेरी सुबह खुशनुमा बना देती है कभी-कभी उसे देखकर, माँ की शक़ की सुई बहुत तेज़ी से घूमने लगती है

उस रोज़ जब मैं खिड़की खोलकर पढ़ रहा था और माँ ने उसे निकलते देख, उससे पूँछा था "किस क्लास में पढ़ती हो ? " उसका गला सूखा हो या ना सूखा हो मैं अवश्य सूख गया था उसके चले जाने पर माँ ने मेरी ओर प्रश्नात्मक निगाहों से देखा था और मैं उत्तरविहीन, अपनी गणित की किताब में उलझा होना जता रहा था

सोचता हूँ कि यदि माँ को बोर्ड परीक्षक बना दिया जाए, तो वे अवश्य ही मेरे हर प्रश्नपत्र में इन्हीं प्रश्नों को रखेंगीं और मेरा रोल नंबर अखबार के किसी भी पन्ने पर नहीं दिखेगा

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मार्च अभी दूर है और बोर्ड के मौसम पर बसंत भारी है लाल-गुलाबी कार्डों की बहार है ख़याल हो आता है कि माँ से कोई बहाना कर कार्ड खरीदने के लिये पैसे माँग लूँ, किन्तु उनके प्रश्न दिन--दिन कठिन होते जा रहे हैं और उसके कंकडों की संख्या अधिक

रात्रि के स्वप्न में संग्रहालय देखा है, जिसमें केवल, उसके कंकड़ और माँ के प्रश्न ही हैं मैं पंक्तिबद्ध होकर उनको देख-सुन मुस्कुरा उठता हूँ बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा है, जिसमें रह-रह कर आवाजें गूँजती है "मैं पढ़ रहा हूँ "

सुबह उठकर, पास के पार्क से, एक गुलाब तोड़ लाया हूँ खिड़की से आती हवा, कानों में रूमानी संगीत बजा रही है साइकिल के चले आने की आवाज़ दूर कहीं से कानों में पहुँचती है दिल ज़ोरों से धड़कने लगा है वो खिड़की के पास पहुँचती जा रही है मैं चुपके से दरवाज़ा खोल बाहर गया हूँ मैं उसके सामने जा खड़ा होता हूँ उसके कदम थम गये हैं मध्य में लम्बी चुप्पी छा गयी है मैं पीठ के पीछे छुपे हाथ को आगे बढाता हूँ वो गुलाब ले, साइकिल के पैडल घुमाती, चुप से चली जाती है

इस बरस भी मैं उससे कुछ ना कह सका......

Saturday, 30 October 2010

फ़िक्शन

छतों पर चाँदनी पसर जाती । अन्ताक्षरी में दबी-छिपी आवाजें रह-रह कर खनक उठती थीं । कोई सुरीली लय, अपने बाद भी, अपने मीठे होने का एहसास कराती रहती । कही किसी कोने से खुसर-पुसर के फूल झड़ते, तो कहीं दो आँखें चारों दिशाओं में इठलाती फिरतीं । और उन सब के बीच, प्रतीक्षा की घडी की सुईयाँ, मन के कलेजे पर धाँय-धाँय कर रेंगतीं ।

उसके आते ही, अम्मा कहतीं "लो आ गई हमारी बेग़म अख्तर, अब देखते हैं हमें कौन हराता है । और फिर सब अपनी-अपनी मुस्तैदी दिखाते । बाज़ी कभी इधर तो कभी उधर । कभी ये पलड़ा भारी तो कभी वो । किन्तु अंततः जीतती बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु की अम्मा ही । और फिर अगले दिन तक उस बात का हो हल्ला रहता । कुछ चेहरे रूठे रहते तो कुछ कहते "हमें नहीं खेलना, यह मुआँ खेल" या "हमको अभी फुर्सत नहीं, जाओ कह दो अम्मा से" । और अम्मा एक दो दिन बाद सब का हाथ पकड़-पकड़ कर इकठ्ठा करतीं । फिर से वही दौर चल निकलता । हँसना, नाचना और गाना ।

उन्हीं दिनों गर्मियों की छुट्टियों में पहली दफा, उस छत पर एक नई आवाज़ गुनगुनाती है । रूठने वाले चेहरों को अपना मसीहा मिल गया और पहली दफा बेग़म अख्तर हार गयीं । हर रोज़ से ज्यादा शोर सुनाई देता है । चाँदनी में नहायी बेग़म अख्तर उर्फ़ मनु का चेहरा रौशन हो रहा है । पहली ही मुलाकात और हम उन्हें खफ़ा कर बैठते हैं । अगले चार रोज़ तक वो छत के उस खेल में शामिल नहीं होतीं । हाँ दोपहर की रौशनी में जब तब उनकी और हमारी आँखें टकरा जाती हैं । मालूम होता है, बच्चू तुम तो गए काम से । खुद अपना ही क़त्ल करने की तबियत लिए बैठे हो ।

चार रोज़ बाद उनके ओठों पर मुस्कराहट लौट आती है । छत का मौसम सुधर जाता है । अब चाँदनी अच्छी नहीं लगती । अँधेरे में एक हाथ पर दूसरा हाथ रह-रह कर आता है । शुरू-शुरू में वो अपना हाथ झटक देती है । और फिर एक-दो रोज़ में उनकी आँखों में में शरारत बढ़ गई है । वो अँधेरे का फायदा उठा चिकोटी काट लेती हैं । हम आह, आउच की आवाजें निकालते हैं । कुछ आवाजें खी-खी कर उठती हैं । अम्मा कहती हैं "क्या हुआ ?" । हम टालते हैं कि मच्छर काट रहा है ।

वो दोपहार को छत पर कपडे पसारने आई है । मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ । वो कह रही है "हमारा हाथ छोडो" । हम प्रत्युत्तर में कहते हैं "अगर नहीं छोड़ा तो" । तो "अम्मा...." । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ । "बस डर गए" कहती हुई, खिलखिलाकर चली जाती है ।

अँधेरा घिर आया है । छत पर महफ़िल जमी है । अम्मा आवाज़ देकर उसे बुला रही हैं । नीचे से आवाज़ आ रही है "आ रहे हैं" । सीढ़ियों पर मैं खड़ा हूँ । हमारा आमना-सामना हुआ है । वो आगे को बढ़ने लगती है । हम हाथ पकड़ लेते हैं । वो कुछ नहीं कहती । हम पास खींच लेते हैं । और उसके कानों के पास जाकर कहते हैं "आवाज़ दो फिर भी नहीं छोड़ेंगे" । वो मुस्कुरा उठती है ।

अम्मा की फिर से आवाज़ आ रही है । दो सुरीले ओठ आपस में मोहब्बत कर रहे हैं । जंग बहुत पीछे छूट गई है ।
मन में ख़याल हो उठता है "अम्मा तुम्हारी बेग़म अख्तर तो अब हमारी हुईं"....

Sunday, 17 October 2010

मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

Indradhanushबारिश बीतती तो आसमान उजला-उजला निखर आता । और तब, जब भी आसमान में इन्द्रधनुष को देखता तो जी करता कि इन साहब के कुछ रंग चुराकर पेंटिंग बनाऊँ । तमाम कोशिशों के बावजूद में असफल होता और इन्द्रधनुष मुँह चिढ़ाता सा प्रतीत होता । नानी कहती "अरे बुद्धू, उससे भी कोई रंग चुरा सकता है भला" । मैं नाहक ही पेंटिंग करने का प्रयत्न करता । मैं मासूम उड़ती चिड़िया को देखता, तो मन करता कि इसको पेंटिंग में उतार लूँ । कई बार प्रयत्न करता और हर दफा ही, कभी एक टाँग छोटी हो जाती तो कभी दूसरी लम्बी ।

बचपन में अच्छी पेंटिंग ना कर पाने का दुःख मुझे हमेशा रहता । मेरा पसंदीदा विषय होते हुए भी, मैं उसे कभी अपने हाथों में नहीं उतार सका । और जब तब रूआसा हो जाता । तब नानी मुझे गोद में बिठाकर कहती "ईश्वर हर किसी को कुछ न कुछ हुनर अवश्य देता है । सबसे ज्यादा जरुरी है, उसकी बनायीं हुई सृष्टि को समझाना, उसे महसूस करना ।"

बचपन बीता और साथ ही पेंटिंग का हुनर सीखने की मेरी ख़्वाहिश भी उसके साथ जाती रही । धीमे-धीमे बड़ा हुआ तो कुछ नयी ख्वाहिशों ने जन्म लिया । कुछ साथ रहीं, तो कुछ ने बीच रास्ते ही दम तोड़ दिया ।

अपने बी.एस.सी. के अध्ययन के दिनों में, मैं घर पर ही गणित की ट्यूशन पढाया करता था । तमाम बच्चे सुबह-शाम ग्रुप में मुझसे पढने आया करते । अधिकतर दसवीं और बारहवीं के बच्चे हुआ करते । और सुबह-सुबह ही गली के मोड़ से चहल-पहल प्रारंभ हो जाती । सर जी नमस्ते, सर जी गुड मोर्निंग जैसे लफ्ज़ गली में सुनाई देते । बच्चे तो बच्चे, उनके माता-पिता भी सम्मान की दृष्टि से देखते ।

उन्हीं सर्दियों के दिनों में, नानी का हमारे घर आना हुआ । जब सुबह-सुबह उठीं तो उन्हें वही आवाजें सुनाई दीं । तमाम बच्चों से उनकी बातें हुईं । और जब शाम को मैं बाज़ार गया तो वहाँ से नानी के लिए शौल लेकर आया । रात के वक़्त मैंने उन्हें वो शौल उढाई । कहने लगीं "बड़ा हो गया है, मेरा नन्हाँ सा पेंटर । तुझे याद है, तू बचपन में अच्छी पेंटिंग ना कर पाने पर दुखी होता था ।" उनकी बात पर मैं मुस्कुरा दिया ।

कहती थी ना मैं "ईश्वर सबको कोई न कोई हुनर देता है । तुझे गणित जैसे विषय में उन्होंने अच्छा बनाया और अब देख कितने बच्चे तुझसे पढने आते हैं । तुझे आदर मिलता है, उनका प्यार मिलता है । दुनिया में जो सबसे अधिक कीमती है, वो तुझे बिन माँगे मिल रहा है ।"

नानी की बातें एक बार फिर मुझे बचपन के दिनों में खींच ले गयीं । जहाँ खुले आसमान के नीचे लेटा मैं, इन्द्रधनुष को देख, उसके रंगों से रश्क कर रहा हूँ । और वो अपनी जबान बाहर कर, अपने कानों पर हाथों को हिलाते हुए मुझे चिढ़ा रहा है....

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* चित्र गूगल से

Friday, 15 October 2010

बचपन की मोहब्बत

उसके गालों पर डिम्पल थे । कितनी क्यूट लगती थी, जब वो हँसती । गुस्सा तो जैसे नाक पर रखा रहता उसके, जब भी मोनिटर-मोनिटर खेलती । हाँ, वो हमारी क्लास की मोनिटर जो थी । और मेरा नन्हा-मुन्ना सा दिल धड़क-धड़क के इतनी आवाजें करता कि बुरा हाल हो जाता ।

जबसे विद फेमिली, वो फ़िल्म देख ली थी, अरे जिसमे वो दोनों कहते थे "दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी" । और मैं मासूम बहक गया, दोस्ती के चक्कर में । मेरा मासूम दिल, जब भी उसको सामने पाता, बस चारो खाने चित्त हो जाता । जबकि मैं सिर्फ़ पाँचवी क्लास में था । हाँ यारों मेरा दिल क्लीन बोल्ड हो गया....मुझे प्यार हो गया ।

जहाँ पहले मैं, उसके सामने, मैडम से याद ना करके लाने पर मार खाता, वहीँ बाद के दिनों में, अपनी रैपुटेशन सुधारने के लिये पाठ कंठस्थ करके लाता ।
"माँ एक रसगुल्ला और दो न, लंच के लिए"
"अरे तू कब से इतना खाने लगा"
अब उन्हें कौन बताये ? कि ये रसगुल्ला, वो निगार खान के लिये ले जा रहा है । और स्कूल पहुँचकर बामुश्किल, हिम्मत करके, कोई बहाना बनाकर, उसे खिलायेगा ।

मेरे प्यार को बस मैं और मेरा दिल जानता था । तब पता भी नही था कि अपने दिल की बात को जाहिर कैसे करें ? यारों उसके चक्कर में मैं होशियार बच्चों की श्रेणी में आ गया ।

बुजुर्ग कह गए हैं कि "कभी-कभी, अपनी किसी भूल का परिणाम, आपको कैसे भुगतना पड़े, आप नहीं जानते" । मैं भी भूल कर बैठा । अपने साथ बैठने वाले दोस्त को, मैंने अपना राजदार बनाते हुए, अपने दिल की बात कह डाली । और वो कम्बखत, निरा गूण दिमाग निकला । उस बेसुरे से रहा नही गया और उसने मेरी मोहब्बत, जो जवान भी न हो पायी थी, का राग, हमारी ही क्लास में पढने वाली, अपनी बहन को अलाप दिया ।

कुछ दिन तो चैन से कटी । हालाँकि, उसकी बहन के माध्यम से, निगार तक बात पहुँच गई होगी । इतना तो पक्का है । केवल इतना रहा, तब तक तो ठीक था । उस कम्बखत से रहा न गया और मेरे इश्क का बैरी, उसे क़त्ल करने के इरादे से, एक बचपन की नादानी कर बैठा ।

उन साहब ने क्या काम किया ?

हमारी महबूबा की फेयर कोपी पर, जो उसकी बहन के पास थी । उसपे लिख मारा, कि "मैं तुमसे प्यार करता हूँ । आई लव यू निगार, मुझसे शादी करोगी ?"
और उसके नीचे हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में गोद दिया । और यह खबर हमें सीना फुलाकर दी ।

अब हमारी तो कर दी न दुर्दशा । मरता क्या ना करता । चलो कोई बात नहीं । किस्मत से, वो अंतिम पीरियड था । उस दिन तो खैर रही । अब घर पहुँचे....
"क्या हुआ ? काहे चेहरा लटका हुआ है ?" माँ पूँछती है ।
"कुछ नहीं...."
अब उनको क्या बताएं, कि अगली रोज़ हमारी मार पड़ने वाली है ।

मालूम था कि मैडम के हाथों, अगली रोज़ बहुत मार पड़ेगी । पेट दर्द का बहाना बना दिया । खुदा न खास्ता, एन वक्त पर, गाँव से हमारे चचा जान आ गए । वो हमें तीन दिन के लिये, अपने साथ रिश्तेदारों के यहाँ ले गये ।

हम सोच रहे थे, कि चलो अब तक मामला शांत हो चुका होगा । मन में तसल्ली का लड्डू खाते हुए स्कूल गए । पर हमे क्या मालूम था, कि हमारे प्यार की ख़बर, पूरी बगिया में फ़ैल गई है । बच्चा-बच्चा वाकिफ हो चला है । उस ससुरे दोस्त ने बात का बतंगड़ बना दिया था । और सारा इल्जाम हमारे मत्थे मढ़ दिया ।

निगार ने हमारी शिकायत क्लास टीचर से कर दी । जिनसे में सबसे ज्यादा खौफ खाता था । फिर क्या था ? पहले ही पीरियड में, टीचर्स रूम से बुलावा लेकर, निगार और उसकी सहेली आ गयीं "तुम्हे मैडम बुला रही हैं" ।

काटो तो खून नही, जैसी स्थति हो गयी थी हमारी ।

मैडम बोली "ये सब क्या है ? दूध के दाँत ठीक से टूटे नही और प्यार करने चले हो । नेकर पहनना आता है ठीक से ? और ये सब खुरापते कहाँ से सीखी तुमने ?"
मैं चुपचाप एक कोने में खड़ा हूँ । 10-20 डस्टर हाथों पर पड़ते हैं, 5-6 चांटे गाल पर पड़ते हैं । कभी इस गाल पर तो कभी उस गाल पर । कान पकड़ कर उट्ठक-बैठक करवाई गयी ।
"बोलो करोगे अब ये सब"
"नही मैडम" मुँह से आवाज़ निकली ।
"सॉरी बोलो इसको"
"सॉरी निगार"
"बोलो निगार, तुम मेरी बहन हो"
मन में सोचा "ये सब क्या है ? ये तो मैं कतई नही बोलूँगा ।"
बोलो...बोलो...
पर मैं खामोश...

"साँप क्यों सूंघ गया, बोलो निगार मेरी बहन है ।"
"मैं फिर भी खामोश ।"
"अरे नही बोलोगे ।"
"चलो मुर्गा बन जाओ ।"

मैं मुर्गा बन जाता हूँ ।
"तुम ऐसे नही मानोगे, जब ऐसे ही मुर्गा बने रहोगे, तब बोलोगे"

दस मिनट गुजरे, फिर पंद्रह-बीस मिनट हुए । टप-टप, आँखों से आँसू निकलने लगे ।
"मैडम लग रही है"
"हाँ, हाँ, तो और लगेगी । बोलो अभी ।"
मैं फिर भी मौन ।

मेरी महबूबा को दया आ गयी । बोली "मैडम रहने दो, जाने दो, छोड़ दो अब । ये नही बोलेगा ।"

मैडम उठा कर, दो-चार और धरती हैं गाल पर । "आइन्दा फिर से ऐसा किया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई ना होगा ।" मन में सोचा "आपसे बुरा है भी नहीं कोई ।"

मार खायी । सज़ा काटी । किन्तु दिल में सुकून था, कि बहन नही बोला । दिल ही दिल में खुश हो रहा था । बाद में सोचता हूँ । चलो बच गये, महबूबा की नज़र में इज्जत तो रहेगी । भले ही उसके सामने मार खा ली ।

फिर क्या, कुछ दिन गुजरे । मामला शांत हो गया ।

एक दिन लंच टाइम में निगार मेरे पास आकर, अपना लंच बॉक्स आगे करके बोली "ये गुलाब जामुन खाओ । आज मेरी बहन का जन्मदिन है । वही हँसता, खिलखिलाता चेहरा और गालों के डिम्पल देख, मन प्रसन्न हो गया । मैंने गुलाब जामुन खा लिया ।

फिर ज्यादातर समय वो मेरे पास आती और मुझे कुछ न कुछ खाने को देती । जब कभी मेरा काम पूरा न होता तो अपनी होम वर्क की कॉपी भी शेयर करती । मैं मन ही मन में प्रसन्न होता । कभी वो मुझे कुछ खिलाती तो कभी मैं...

वो एक दिन बोली "तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते थे ना । अब तो हम दोस्त हैं न ।"
मैंने कहा "धत, दोस्ती ऐसे थोड़े होती है ।"
"तो कैसे होती है ?"
"गर्ल फ्रेंड तो गाल पर किस करती है ।"
"अच्छा तो लो" और उसने मेरे गाल पर किस कर लिया ।

यारों अपनी तो लाइफ सेट हो गयी । अब वो मेरी गर्ल फ्रेंड बन गयी....

कुछ दिन दोस्ती के अच्छे बीते । साथ झूलना...साथ बैठना...साथ खाना । अब मुझ पर मोनिटरगीरी भी नही दिखाती थी । सब कुछ अच्छा चला । पाँचवी के बाद, मेरे प्यार को किसी की नज़र लग गयी । उसके पिताजी का ट्रांसफर हो गया । वो कहाँ चली गयी ? किस शहर ? पता ही नही चला ।

मेरी मोहब्बत, मेरी दोस्ती का दी एंड हो गया....

पापा ने मुझे दूसरे स्कूल में डाल दिया । जहाँ निरे लड़के ही लड़के भरे पड़े थे । और मैं उनके साथ, उनकी शरारतों में रम गया । हाँ कभी कभी, अपनी गर्ल फ्रेंड की याद आ जाती....जैसे कि आज आ गयी :) :)

Tuesday, 5 October 2010

सर्दियों की धूप में गाँव

दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत हैं । मटर के पौधे शर्मा कर झुक गये हैं । उधर गाजर लाल हुई जा रही है । सुबह की ओस मोती बनकर मेरे पैरों तले आकर अवर्णित सुख दे रही है । मैं चने के पौधे को तोड़ लेता हूँ । कच्चे चने खाने का सुख ले रहा हूँ । चाचू सीटी बजा रहे हैं । मैं कहता हूँ "चाचू मुझे भी सिखाओ ना" । वो कहते हैं "नहीं, गन्दी बात" । वो मेरे लिये फिर भी अच्छे बने रहते हैं । वो हर रोज़ यही बात कहकर टाल जाते हैं । और मैं इस हुनर को सीखना चाहता हूँ, सीटी बजाने का सुख भोगना चाहता हूँ । जब भी उदास हो या खुश तो सीटी गुनगुनाकर दिल बहला लो । कई दिन बीत गये हैं और उन्होंने मुझे अपना शिष्य बना लिया है ।

शाम का वक़्त है और गाँव अँधेरे में गुनगुना रहा है । हम सभी चचा-ताऊ के बच्चे मिटटी के चूल्हे को चारों ओर से घेरे बैठे हैं । माँ गरमा-गरम रोटियाँ बना रही है । कढाई से सब्जी थाली में निकाल कर, उसी में एक ओर रोटी रखकर खाने में आनंद आ रहा है । माँ बीच-बीच में टोक कर कहती है "थोड़ी ठंडी तो होने दे" । मैं फूली हुई रोटी को तोड़कर उसे फूँक-फूँक कर खा रहा हूँ । फिर सोचता हूँ कि माँ कभी-कभी तो बिना चिमटे के रोटी निकाल कर मुझे देती है । और देखो तो मेरी फ़िक्र कर रही है । तब लजीज़ शब्द से परिचित नहीं हूँ किन्तु ऐसा ही कोई शब्द माँ से कह देना चाहता हूँ, उसकी बनायीं हुई रोटियों और सब्जी के बारे में ।

शाम के आठ बजे हैं और गाँव की रात हो गयी है । बुजुर्ग लोग लकड़ियों और उपलों को एकत्रित कर उसमें आग लगाये, चारों ओर बैठे हैं । उनमें से कोई आल्हा-ऊदल को सुना रहा है । इन सबके मध्य में बैठा गर्माते-गर्माते सो गया हूँ और दादा जी बाद में कंधे पर टाँग मुझे खाट पर लिटा आये हैं । कुछ देर बाद माँ उठाकर ले गयी है । पुनः नींद के आगोश में जाने से पहले दूध और गुढ ख़त्म करना होगा । सुबह माँ से पूँछता हूँ "मैं दादा जी के पास से कैसे आया" । माँ कोई जवाब नहीं देती, बस मुस्कुराते हुए मट्ठा फेरने लगती है । मुझे मट्ठे में बाजरे की रोटी और गुढ मिलाकर खाना पसंद है । और माँ को मुझे दही खिलाना । हम दोनों खुश हैं ।

मेरे लिए लकड़ी की पट्टी आ गयी है । उसे हर सुबह घिस-घिस कर चमकाना होता है । खड्डी, दवात और कलम मेरे साथी बन चुके हैं । स्कूल में मास्टर जी लिखना सिखाते हैं । कलम से लिखने पर गीले को सुखाने के लिए धूप दिखा देता हूँ । अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः सीख चुका हूँ । इसके आगे क्या लिखा जाता है ? ये जानने के लिए उत्सुक हूँ किन्तु शेष बच्चे अभी उसी में अटके हैं । मैं पेड़ों पर बैठी चिड़िया को देखने में स्वंय को व्यस्त कर लेता हूँ ।

अबके पिताजी कई दिनों बाद आये हैं । मैं सीटी गुनगुनाना जान गया हूँ । पट्टी को चमकाने से लेकर सभी अक्षरों से परिचित हूँ । पिताजी ने माँ से अबके साथ चलने के लिए कहा है । माँ अपने और हम दोनों भाइयों के कपडे रख रही है । हम खेतों की पगडंडियों से होते हुए मुख्य सड़क तक पहुँच गये हैं ।

मैं बस की खिड़की से बाहर झाँक रहा हूँ । मटर, गाजर, मूली, शकरकंद और चने के खेत एक-एक कर पीछे छूटते जा रहे हैं । याद हो आता है पट्टी, कलम, दवात घर में ही छूट गये । पिताजी बता रहे हैं, अब तुम कॉपी पर लिखोगे । पेड़ों पर से आती धूप आँखों में चुभ रही है । माँ खिड़की बंद कर देती है । गाँव अब नहीं दिखता । बहुत कहीं पीछे छूट गया है.....

Saturday, 2 October 2010

स्मृतियों से वो एक दिन

सन् उन्नीस सौ सतानवे की कोई ठंडी सुबह....

मैं छत पर औंधे पड़े हुए सोचने में मग्न हूँ । सर्दियों की धूप भी कितनी मुलायम होती है । माँ नीचे स्नान कर रही होंगी, उसके बाद पूजा और फिर मुझे पुकारेगी । मैं आवाज़ दूँगा "हाँ माँ, अभी आता हूँ" । हालाँकि तब भी मेरे पास कोई काम नहीं होगा किन्तु देर लगा कर स्वंय का व्यस्त होना जताउँगा । फिर माँ पूँछेंगी "क्या कर रहे थे ?" कब से पुकार रही हूँ और फिर दबी आवाज़ में कहेंगी "ये लड़का भी न जाने कहाँ खोया रहता है" । माँ फिर मेरे सामने नाश्ते की थाली रख देंगी और मेरे खाते समय, मेरे सर पर हाथ फेरेंगी । फिर वो कहेंगी "क्या सोचते रहते हो ?" । मैं खाता रहूँगा और इसी बीच में उत्तर कहीं खो जायेगा । उन्हें उत्तर की प्रतीक्षा नहीं होगी । मैं उठकर आधा गिलास पानी पियूँगा और आधे से हाथ धो लूँगा । माँ के पल्लू से हाथ पौछूँगा और देहरी से बाहर चला जाउँगा ।

करवट लेता हूँ और देहरी से बाहर के संसार में पहुँच जाता हूँ ।

उसका आज जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है । न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।

उसके सख्त निर्देश हैं कि वह अपना जन्म दिन अँग्रेजी तरीके से मनाएगी । इसीलिए कल ही यह बताकर उसने मुझे उलझन में डाल दिया कि वो रात के बारह बजकर एक सेकंड पर मुझे अपने सामने देखना चाहती है । मैं इस बात पर उसकी कम उम्र पर चिढ़ता हूँ । सोचता हूँ कि यदि हम पच्चीस बरस के होते, तो वो कभी ऐसा जोखिम उठाने के लिए नहीं कहती । फिर स्वंय की इस समझदारी पर संतुष्ट सा महसूस करता हूँ ।

रात के दस बज रहे हैं और मेरा दिल घड़ी की टिक-टिक से भी तेज़ आवाज़ कर रहा है । माँ कमरे में दूध का गिलास रखकर चली गयी हैं । जाते जाते कह गयी हैं "सो जाओ और सुबह जल्दी उठकर पढ़ लेना" । उनकी संतुष्टि के लिए लाइट बंद कर देता हूँ । मैं हमेशा सुबह देर से उठता हूँ और माँ हमेशा सुबह जल्दी उठने का बोलकर जाती हैं ।

ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हो गए हैं । उठकर किताबों में दुबके गुलाब को बाहर निकालता हूँ, सिरहाने से गुलाबी कार्ड को हाथों में ले, उसकी छत पर रवाना होने के लिए स्वंय को तैयार करता हूँ । उसने कल रोज़ जाते-जाते दो बार याद दिलाया था कि हम उसकी छत पर मिलेंगे । मैं पहली दफा बिना बताये उसकी छत पर जाने के ख्याल से पसीना-पसीना हुआ जा रहा हूँ ।

अपनी छत से लगी दो छतों को फलाँग कर उसकी छत पर पहुँचता हूँ । ग्यारह बजकर उनसठ मिनट हो गए हैं । वो अभी तक नहीं आई । सूनी पड़ी गलियों में कुत्ते गश्त लगा रहे हैं । आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं । छतों पर हल्की धुंध की चादर तन गयी हैं । दूर से बारह के टनटनाने की आवाज़ आई है । छत पर किसी के आने की आहट, दिल धकधक करने लगा, वो शौल ओढ़े हुए बिलकुल नज़दीक आ गयी । उसे पहचान कर पहली दफा इतनी ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ ।

"हैप्पी बर्थ डे, माय लव" सुनकर वो खिलखिला जाती है । उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर "हैप्पी बर्थ डे" बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । "अच्छा तो अब मैं चलूँ" ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से चिपके हुए हैं । पहली बार उसकी गर्म साँसों और होठों को महसूस कर रहा हूँ ।

"अच्छा तो अब मैं चलूँ" कुछ देर बाद अलग होते हुए फिर से कहता हूँ । अबकी वो मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाती है । मैं पहली छत की दीवार फलाँग कर चलने को होता हूँ । वो अभी भी छत पर है । फिर से लौट पड़ता हूँ । पास आकर "आई लव यू" कहता हूँ । वो मुस्कुरा जाती है और प्रतिउत्तर में "आई लव यू टू" कहती है ।

और फिर वे सभी क्षण स्मृतियों में लॉक हो जाते हैं ....

Friday, 1 October 2010

अख्तर मियाँ

फरवरी की एक अलसाई दोपहर

हवा ग़ज़ल गुनगुना रही हैं, मैं कहीं ख्यालों की सैर पर निकला हुआ हूँ । अख्तर मियाँ आ धमकते हैं । इनका तार्रुफ़ इतना है कि ये शरीफ़ आवारा हैं । शेर हर वक़्त बगल में दबाये घूमते हैं और जो कहीं महफ़िल जम गयी तो साहब चिराग बन उसे रोशन कर देते हैं । 'अमाँ यार' उनका तकिया कलाम है । हाल-चाल पूँछने की इन्हें खास बीमारी है ।

आते ही बिस्तर पर काबिज़ हो जाते हैं ।
-"अमाँ यार" तुम तो ईद के चाँद हुए जा रहे हो । अम्मी तुम्हें याद कर रही थीं ।
-"ह्म्म्म" मैं होश में आता हूँ ।
-ये तो कोई जवाब नहीं हुआ । कहाँ खोये हुए हो ?
-गहरी साँस लेता हूँ ।
-अमाँ ये हो क्या रिया है ? जवानी कहाँ बर्बाद किये बैठे हो । माथे पर हाथ रखते हैं । तबियत तो दुरुस्त मालूम होती है । अब कुछ बकोगे भी या हम ही कुछ फ़रमायें ।
-मैं उनके चेहरे को बात टालने के उद्देश्य से देखता हूँ ।
-वो शेर कहते हैं :
मत पूँछ, कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख, कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे ।

"अब बताओगे भी कि माज़रा क्या है ?" शेर खत्म होते ही वार करते हैं ।

-कुछ नहीं है अख्तर, खामखाँ परेशान ना करो ।
-तो बात यहाँ तक पहुँच गयी । लौंडा बर्बाद हुआ जा रिया है, उनकी याद में । कौन है ? ज़रा हमें भी तो इत्तिला की होती । कुछ ना सही तो दो लफ्ज़ ही सुन लेते ।
-क्या, कौन है ? क्या बातें किये जा रहे हो ?
-वाह मेरे शेर, हम दुनियाँ को बनाते हैं और तुम हमें....खैर जाने दो, हम होते ही कौन हैं ?
-देखो अख्तर मियाँ, ये इमोशनली ब्लैकमेल मत किया करो ।
-तो बताओ, क्या माज़रा है ?
-कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं ।

वो थोड़े गुस्से में आकर झल्लाते हुए उठकर बैठ जाते हैं । इधर उधर निगाह दौडाते हैं । किताबों के दरमियाँ गुलाब बाहर झाँक रहा है । वो फटाक से उठकर वहाँ पहुँचते हैं । गुलाब हाथ में लेते हैं ।

-तो ज़नाब इश्क फरमा रहे हैं ।
-"ऐसा कुछ भी नहीं है" थोडा सकुचाते हुए कहता हूँ ।
-अमाँ तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोई चोरी कर रहे हो । अरे इश्क तो सभी करते हैं । शाहजहाँ ने किया था । अकबर ने किया था । हमारे अब्बू ने किया था । अरे हाँ अब्बू से याद आया । वैसे मामला कहाँ तक पहुँचा ?
-"क्यों, तुम्हारे अब्बू कहाँ से आ गये इसमें ?" मैं मुस्कुराते हुए कहता हूँ ।
-अब्बू तो नहीं आये, मगर हम जरुर आ गये ।
-ऐसा कुछ नहीं है यार ।

वो शेर कहते हैं :
तेरे वादे पे जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता ।

-देखो हमें नदीम ने सब बता दिया है ।
-"क्या बता दिया है ?" फिर से अंजान बनते हुए कहता हूँ ।
-यही कि तुम अंग्रेजी ट्यूशन के बहुत चक्कर लगा रहे हो । और जहाँ तक तुम्हारी अँग्रेजी का सवाल है, वो इतनी भी बुरी नहीं मालूम होती हमें ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-तो किला फतह कर लिया, मालूम होता है ।

कुर्ते की जेब से कागज़ निकालता हूँ । उन्हें पेश करता हूँ । वो लपक के पढने लगते हैं ।
-वाह, ख़त का दौर चल निकला और तुम अब बता रहे हो ।
-मैं बताने ही वाला था ।
-और अभी कुछ वक़्त पहले क्या हो रिया था ?
-अरे वो तो तुम्हें बना रहा था ।
-वाह मियाँ । पूरे आगरे में तुम्हें हम ही मिले हैं बनाने के लिए ।
-मैं मुस्कुरा देता हूँ ।

वो शेर कहते हैं :
इश्क पर जोर नहीं, है यह आतश ग़ालिब
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने ।

स्मृतियों में अख्तर मियाँ की बातें आज भी खुशबू फैलाती हैं । ना मालूम इन दिनों, किस शहर में होंगे अख्तर मियाँ....

Thursday, 30 September 2010

तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

-सुनो आँखें बंद करो ।
-क्यों ?
-अरे बंद करो ना ।
-पहले बताओ फिर ।
-आँखें बंद करने पर मैं तुम्हें कहीं ले चलूँगा ।
-कहाँ ?
-"ओह हो" कहता हुआ मैं उसकी आँखों पर अपनी नर्म हथेलियाँ रख देता हूँ ।

अब मैं तुम्हें अपनी पसंदीदा जगह पर ले जा रहा हूँ ।


अपने घर के पीछे का दरवाजा खोलते ही तुम अपने पैरों तले बिछी हरी घास पर दौड़ रही हो । उन पर बिखरी हल्की-हल्की ओंस की बूँदें ऐसे चमक रही हैं, जैसे मोती । दूर-दूर तक फैला हुआ नीला आसमान है । और उस पर अपनी खूबसूरती बिखेरता इन्द्रधनुष ऐसा लग रहा है मानों उसने अभी अभी होली खेली हो । उसे देखते ही तुम दौडी-दौडी आकर मेरा हाथ पकड़ लेती हो और कहती हो "वो देखो इन्द्रधनुष, कितना प्यारा है ना" । तुम खिलखिला कर हँस रही हो, बिलकुल मासूम, उज्जवल हँसी । जिसमें तुम शामिल हो, मैं शामिल हूँ और तुमने उसमें इन्द्रधनुष के रंग कब शामिल कर लिए मुझे पता ही नहीं चला ।

हरी घास के एकतरफ बनी हुई पगडंडियों पर तुम नंगे पैर दौडे जा रही हो और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ । डर रहा हूँ कहीं तुम गिर ना जाओ । किन्तु तुम यूँ लग रही हो जैसे हवा ने तुम्हारा साथ देना शुरू कर दिया है । राह में वो सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा तमाम रंग-बिरंगे गुब्बारे लेकर खड़े हुए हैं । हरे, लाल, पीले, गुलाबी, नीले, हर रंग में रंगे हुए गुब्बारे । तुम उन्हें देखकर ऐसे खुश हो रही हो जैसे एक मासूम बच्ची हो । उन गुब्बारों में एक रंग मुझे तुम्हारा भी जान पड़ता है, मासूमियत का रंग या शायद प्यार का रंग या फिर ख़ुशी का रंग ।

जानता हूँ तुम्हें वो गुब्बारे चाहिए इसी लिए पास आकर मेरा हाथ पकड़ कर चल दी हो । गुब्बारे मिल जाने पर तुम कैसे दौडी-दौडी जा रही हो । और एक ही पल में तुमने उन गुब्बारों को छोड़ दिया है, एकदम स्वतंत्र । किसी पंक्षी की तरह वो उडे जा रहे हैं या शायद तुम्हारी तरह, ना जाने किस देश । और पास आकर तुम जब ये पूँछती हो कि "ये उड़ कर कहाँ जाते हैं ?" मैं बस मुस्कुरा कर रह जाता हूँ । तुम कहती हो "बोलो ना" । मेरी मुस्कराहट देखकर तुम फिर बाहें फैलाये दौड़ने लगती हो ।

आगे तुम्हें सेब का बाग़ दिख जाता है और तुम दौड़ती हुई उसमें चली जाती हो । कहीं छुप कर मुझे आवाज़ देती हो "कहाँ हूँ मैं ?" और फिर तुम्हारी खिलखिलाती हँसी गूँज जाती है । एकदम से पंक्षियों के चहचहाने की आवाज़ में घुली सी लगती है तुम्हारी हँसी । तुम पेडों की ओट में छुपी हुई बार-बार मुझे आवाज़ देती हो । कभी इस पेड़ के पीछे तो कभी उस पेड़ के पीछे । जानता हूँ तुम्हें लुका-छुपी का खेल बहुत पसंद है । मेरे थक जाने पर कैसे अचानक से, पीछे से आकर तुम मुझे अपनी बाहों में थाम लेती हो और मेरे सीने से लग जाती हो । मैं तुम्हें बाहों में लेकर हवा में झुलाता हूँ । फिर तुम सेब तोड़ कर पहले खुद चखती हो और मुझे देती हो कि "खाओ बहुत मीठा है" ।

पास ही बह रही नदी जो ना जाने कहाँ दूर से चली आ रही है और ना जाने कहाँ जा रही है । शायद कुछ गाती सी, गुनगुनाती सी । पास ही की उस बैंच पर तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले जाती हो और उस पर बैठते ही तुम मेरे कंधे पर अपने सर को रख लेती हो । हम बहुत देर तक खामोश रह नदी के बहने को देखते रहते हैं । पानी में उसके अन्दर के छोटे-छोटे पत्थर साफ़ दखाई दे रहे हैं । रंग-बिरंगी मछलियों को देखकर तुम्हारे लवों पर मुस्कान बिखर गयी है । जिनसे तुम्हारे लवों की मिठास बढ़ गयी सी लगती है ।

हम यूँ ही घंटो खामोश रह एक दूसरे से बातें करते रहे । फिर तुम कहती हो कि तुम्हें नदी में नहाना है । मैं तुम्हें मना नहीं कर सकता, ये तुम जानती हो । जानता हूँ भीगने पर तुम्हें सर्दी भी लग सकती है । तुम नदी के पानी में चली जाती हो । तुम भीग चुकी हो और हाथ देकर मुझे बुलाने लगती हो "आओ ना" । और हम दोनों बहुत देर तक उसमें नहाते रहते हैं । आस-पास के पेडों पर से पंक्षी हमारा नहाना देख रहे हैं । उन पर नज़र जाते ही तुम शरमा जाती हो और मेरे सीने से लग जाती हो । उन पलों में तुम्हारे लवों की मिठास का मुझे एहसास होता है । हमारी साँसे एक दूसरे में घुल सी जाती हैं ।

पास के ही पत्थरों से बने टीले पर सूरज गुनगुनी धूप देकर जा रहा है । शायद कहीं से इकट्ठी कर कर लाता हो । हम अपने-अपने कपडों को उस गुनगुनी धूप में, पत्थरों पर सूखने के लिए छोड़ देते हैं । उतनी प्यारी गुनगुनी धूप में लेटने का हम आनंद ले रहे हैं । पास ही में रखे हुए रंगों से तुम रंगोली बनाने लग जाती हो और बार बार मुझे मुस्कुरा कर देखती हो । मेरे कहने पर कि "क्या देख रही हो" । तुम कहती हो कि "तुम्हारी आँखों से ख्वाब चुरा कर उनमें रंग भर रही हूँ । मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।

हमारे कपडे सूख जाने पर हम वहाँ से चल देते हैं । सूरज डूबने लगता है । वो दूर नदी में डूबता सा प्रतीत होता है । तुम मुझसे पूंछने लगती हो "क्या सूरज नदी में रहता है?" मैं डूबते सूरज को एक बार फिर देखता हूँ और तुम्हारे हाथों को थाम कर वापस चल देता हूँ । रास्ते में खड़े वही बाबा अबकी बार आइस क्रीम बेच रहे हैं । तुम पगडंडियों पर दौड़ती हुई उनके पास पहुँचती हो । मेरे कहने पर कि तुम्हें सर्दी लग जायेगी । तुम आइस क्रीम लेने के लिए जिद करती हो ।

कुछ दूर हम दोनों आइस क्रीम खाते हुए चले जा रहे हैं । वापसी में हमें गुलाबों से भरा बगीचा मिलता है । मैं जब गुलाब को तोड़ने लगता हूँ तो तुम पूंछती हो कि "गुलाब को दर्द तो नहीं होगा ?" मैं ना में सर हिलाता हूँ । साथ चलते चलते मैं तुम्हारे बालों में गुलाब लगा देता हूँ । तुम मुस्कुराते हुए मेरी आँखों में झांकती हो ।

चलते-चलते फिर से तुम खिलखिला जाती हो । ढेर सारी रंग बिरंगी-तितलियाँ वहाँ से गुजरती हुई जा रही हैं । तुम्हारे चारों ओर से आकर कुछ कह रही हैं । शायद सूरज के डूबने पर अपने घरों को जा रही हैं और तुमसे ख़ास तौर पर अलविदा कहने चली आई हैं । तुम एक तितली को अपनी हथेली पर बैठा कर कुछ बोलती हो । शायद अलविदा ही कहा होगा ।

खुशियाँ बिखेरती हुई तितलियाँ अपने अपने घरों को चली जाती हैं । तुमने मेरा हाथ फिर से पकड़ लिया है और हम चहलकदमी करते हुए अपने दरवाजे तक पहुँच गए हैं । फिर तुम अचानक से मेरे गाल को चूम कर दरवाजा खोलकर अन्दर चली जाती हो । मैं मुस्कुराता हुआ तुम्हारे साथ आ जाता हूँ ।

सुबह उठ कर तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख कर बोल रही हो "कहाँ ले गए थे मुझे" । और मैं तुम्हारे बालों को चूमकर कहता हूँ "हमारी पसंदीदा जगह" । तुम मुस्कुरा जाती हो ।

* (इस पोस्ट का सही स्थान शायद यही है । अतः पुनः प्रकाशित कर दिया ।)

Tuesday, 28 September 2010

सुकून

बीते हुए दिनों के अँधेरे जंगल से निकल, उजले वर्तमान का सुख सुकून नहीं देता । वो बंद पुराने बक्से में पड़ी जर्ज़र डायरी के सफहों में सुरक्षित अवश्य होगा । उसे छुआ जा सकता है किन्तु पाया नहीं जा सकता । वक़्त-बेवक्त सूखी स्याही को आँसुओं से गीला करना दिल को तसल्ली देना भर है । इससे ज्यादा और कुछ नहीं ।

तुम भी दो सौ गज की छत पर कपड़ों को सुखाकर, कौन सा सुकून हासिल कर लेती होगी । रात के अँधेरे में, बिस्तर की सलवटों के मध्य, थकी साँसों के अंत में क्षणिक सुख मिल सकता है । सुकून फिर भी कहीं नहीं दिखता । और फिर ये जान लेना कि मन को लम्बे समय तक बहलाया नहीं जा सकता । बीते वक़्त के सुखद लम्हों में तड़प की मात्रा ही बढ़ाता है । जानता हूँ उस पछताने से हासिल कुछ भी नहीं ।

वैज्ञानिक दावों को मानते हुए कि इंसान के जिंदा रहने के लिये साँसों को थकाना अति आवश्यक है की तर्ज़ पर भविष्य के साथी को भोगने से भी संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता । और फिर उसकी उम्मीदों पर खरा उतरते उतरते स्वंय के होने को बचाए रखना भी कम कलाकारी नहीं होगी । ये बात अलग है कि उस कला के लिये पुरस्कार वितरित नहीं होते । अन्यथा उस खेल के एक से एक बड़े खिलाड़ी संसार में मौजूद हैं । मैं तो कहीं ठहरता भी नहीं ।

एटीएम और क्रेडिट कार्ड पर खड़े समाज में ठहाकों के मध्य कभी तो तुम्हारा दिल रोने को करता होगा । दिखावे के उस संसार में क्या तुम्हारा दम नहीं घुटता होगा । चमकती सड़कों, रंगीन शामों और कीमती कपड़ों के मध्य कभी तो तुम्हें अपना गाँव याद आता होगा । कभी तो दिल करता होगा कच्चे आम के बाग़ में, एक अलसाई दोपहर बिताने के लिए । कभी तो स्मृतियों में एक चेहरा आकर बैचेन करता होगा ।

फिर भी अगर तुम्हें कहीं सुकून बहता दिखे, तो एक कतरा मेरे लिए भी सुरक्षित रखना । शायद कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए । वैसे भी, अभी भी कुछ उधार बनता है तुम पर ।

Monday, 27 September 2010

उसकी होम साइंस

मैं फिजिक्स का विद्यार्थी हूँ और होम साइंस की किताब चुपके से पढ़ रहा हूँ । पढने के बाद अंगडाई लेता हूँ जैसे हवाई जहाज कैसे बनता है, जान लिया हो । बाहर देहरी पर दस्तक हुई है, चुपके से किताब को यथास्थान रख देता हूँ और फिजिक्स के डेरीवेशन की किसी पंक्ति पर लटक जाता हूँ ।

बाहर मनु और उसमें कुछ खुसर-पुसर हो रही है, फिर खी-खी की आवाज़ । उठता हूँ और जाकर घड़े से गिलास भर पानी, बूँद-बूँद पीता हूँ । चोर निगाहों से उसे देखता हूँ । पकड़ा जाता हूँ और मुस्कुराकर छोड़ दिया जाता हूँ । रिहा होकर फिजिक्स के बगीचे में चला जाता हूँ ।

जानता हूँ, अब वो कहेगी "अच्छा मनु, अब मैं चलती हूँ वरना माँ डाँटेगी", देहरी के बाहर निकलेगी, वापस मुड़ेगी और मेरे बगीचे में आकर होम साइंस का जहाज उड़ा कर चली जायेगी" । दो बार में अपनी किताब लेकर जाने की उसकी छह महीने पुरानी आदत है ।

आज मनु, माँ के साथ बाहर गयी है । मैं सर्किल के सवालों की परिधि में हूँ । बाहर निकलता हूँ, एक और सर्किल, और फिर दो आँखें बना रहा हूँ, एक नाक और बाल खराब हो गये । "देखा, कर दिये ना खराब" देहरी पर वो खड़ी मुस्कुरा रही है ।

-उसके पूँछने से पहले जवाब देता हूँ"मनु तो बाहर गयी है" ।
-"अच्छा, मुझे नहीं पता था " कहते हुए मेरा बुद्धू होना जताती है ।
-मेरे पास शब्द नहीं ।
-"गाज़र का हलुआ लेकर आयी थी । मनु के लिये, तुम मत खाना ।" बाद के शब्द प्यार से बोलती है ।

टिफिन रखती है और चल देती है । मुड़कर वापस आती है "अच्छा वैसे किसकी शक्ल बिगाड़ने की कोशिश थी" । मैं शरमा जाता हूँ । "देखो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा है" कहती हुई बैठ जाती है । मैं गणितज्ञ होने की कोशिश में लग जाता हूँ । वो होम साइंस के शस्त्र निकाल लेती है ।

-अच्छा तुम ऐसे हो या बनने की कोशिश करते हो ?
-चुप्पी, कोई जवाब नहीं ।

वो हाथ से पैन छीन लेती है ।
- "नम्रता" पहली बार उसके सामने उसका नाम लेकर बनने की कोशिश करता हूँ ।
-"हाँ, नम्रता, फिर आगे, आगे कुछ" वो देखकर मुस्कुरा रही है ।
-यू आर टू मच
-यस, आई एम
-पैन दो
-बस, पैन के लिये इतने नाटक ।
-मैं मुस्कुरा जाता हूँ ।
-बुद्धुराम, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता ।

वो उठती है । पैन फैंक कर देती है "लो रखो इसे सीने से लगाकर" । चल देती है । देहरी के बाहर पहुँच कर याद दिलाती है "हलुआ तुम्हारे लिये ही लायी थी, मनु सुबह खा चुकी है" ।

कमरे में उसकी खुशबु घुल सी गयी है । लम्बी साँस लेता हूँ और सर्किल बनाकर रुक जाता हूँ । याद हो आता है, उसे उसका चेहरा बहुत प्यारा है । सोचकर मुस्कुरा उठता हूँ , हमारी पसंद कितनी मिलती है ।

फिर से सर्किल की परिधि पर घूम रहा हूँ, राउंड एंड राउंड एंड राउंड....
 

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