Sunday, 16 January 2011

छुट्टियों के वे दिन

बाद छुट्टियों के हम घण्टों छत पर बैठे रहते . वो बीते दिनों के अपने दिल्ली के किस्से सुनाती रहती . उसके किस्सों में दुहराव आने पर भी यकीन न होता कि यह वही बात है जो उसने बीते रोज़ सुनाई थी . मैं अपनी आँखें मूँद लेता और मन की सतह पर उसके स्वर को महसूस करता . और तब एकाएक वह पूँछती "तुमने पीछे क्या किया ?"

मैं आँखें मूँदे रहता, इस कोशिश में कि यह केवल मेरा भ्रम है . नहीं तो इस कठिन प्रश्न का उत्तर क्या मैं दे सकूँगा ? क्या यह शब्दों में समाहित हो सकेगा ? नहीं ! और मैं प्रयत्न करता, कि मैं बच सकूँ . अपने अकेलेपन को दूर धकेल सकूँ . जिसने बीती छुट्टियों में मुझे आ घेरा था . जब वह दिल्ली में थी और मैं यहाँ - एकदम खाली, निपट अकेला . और जब वह चली जाती तब मैं तौलता, कभी इस पलड़े पर रखकर तो कभी उस पलड़े पर रखकर - अपने बीते अकेले दिनों को .

क्या यह एक उत्तर में उतर सकेगा कि उसके पीछे उसकी याद को परे धकेलने का अंतहीन प्रयास होता . किन्तु उसकी याद मन की सतह पर रेंगती रहती, एक सिरे से दूसरे सिरे तक और हर सिरा घूमकर पुनः स्वंय से जा मिलता .

मई-जून के वे सुलगते दिन इतने लम्बे और उबाऊ होते कि कहीं भाग जाने को दिल करता . दोपहर को नीम की निमोरियाँ झरतीं और गर्म हवा के थपेड़े जब गालों को झुलसा देते, मैं बीती सर्दियों में उसका लिखा पत्र निकाल लेता . और उसकी दुनिया में प्रवेश कर जाता - शीतल, सुरक्षित और अपने में पूर्ण . मैं एक ही पंक्ति को कई रूपों में पढ़ता, एक बार, दो बार, अनेकों बार .

देर शाम जब उसकी याद की हूक उठती तो घण्टों छत पर औंधे मुँह पडा रहता . जहाँ वो बातें किया करती थी . तब दिल्ली, शहर नहीं, अपने में एक सम्पूर्ण देश प्रतीत होता - दूर, बहुत दूर . जहाँ वह अपनी छुट्टियाँ बिता रही होगी . और हर बीते एक दिन का किस्सा अपनी स्मृति में कैद कर रही होगी . ताकि जब वह यहाँ आये तो हमारे मध्य मौन न पसर जाए .

जब वह यहाँ, अपने बीते दिनों को वर्तमान के इन दिनों में घसीट लाती तो बीत गया अकेलापन भी उनके साथ घिसटता हुआ चला आता . और तब मैं शून्य में निहारती उसकी आँखों को देखता जो वहाँ से बटोर-बटोर कर उन बातों को मेरे पास ले आती . अपने उन अकेले दिनों को, जिन पर वो इन किस्सों की पर्त चढाने का प्रयत्न करती, किन्तु वे रह-रह कर चमक उठते, कभी इस कोने से तो कभी उस कोने से .

और तब उसके उन बीते दिनों के अकेलेपन की सीमा रेखा को भेदता हुआ, मेरा अकेलापन जा मिलता . उन्हें पहचानना दुरूह हो जाता, कि यह उसका कोना है और वह मेरा कोना . वह मन की सतह पर काई की तरह जमा रहता . हम उसे खुरच कर बुहारने का भरसक प्रयत्न करते किन्तु उसके बाद के वे धब्बे फिर भी चमकते रहते - अपनी नई पहचान के साथ .

3 comments:

richa said...

ये स्मृतियाँ कितनी ख़ूबसूरत होती हैं ना... शायद उस इन्सान से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत और अपनी, जिससे जुड़ी वो स्मृतियाँ होती हैं... अकेलेपन में भी हमें अकेला नहीं छोड़तीं... हर बार हमारा हाथ थाम के उन प्यारे पलों से फिर से मिला लाती हैं... कुछ पल को ही सही हम फिर से जी उठते हैं... :)

वन्दना said...

मौन हूँ और महसूस कर रही हूँ।

V!Vs said...

:)

 

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