Tuesday, 1 March 2011

गुलाबी इश्क़

वे शराफ़त के दिन थे । हम में अपने-अपने हिस्से की शराफ़त बची रहती थी । वो घंटों मुझे, तेरी वाली की खातिर, अपनी बालकनी में आसरा देता । हम तब तलक चाय के चार प्याले सुड़क जाते और उसकी अम्मी उफ़ तक ना करती । और वे जब खाना परोस देतीं तो हम अपना सुस्ताना जताते । चौथे बुलावे पर भी जब हम टस से मस ना होते तो वे कहतीं कि ऐसा भी क्या पहाड़ उठाये हो, जो एक निवाले तक की फुर्सत नहीं ।

मैं पहला निवाला उनके मुँह की ओर बढ़ाता तो वे मुस्कुरा उठतीं "बड़ी फ़िकर है हमारी, दस दफा बुलाने पर कदम हरकत करते हैं, ये भी नहीं कि अम्मी भूखी होंगी । जाओ हम नहीं खाते । मैं उनकी दो-चार मिन्नतें उठाता और पीछे से अख्तर अपना प्यार जताता । दो निवालों में ही उनकी भूख जाती रहती । और फिर हम दोबारा जंग में उतरने के लिए बड़े-बड़े कौर गले से जल्दी-जल्दी नीचे उतारने लगते । वे कहतीं "ऐसी भी क्या जल्दी है, ज़रा सा तो शऊर दिखाओ" और मैं कहता "शऊर भी कोई दिखाने की चीज़ है, ये जान लो अम्मी कि हमे दिखावा पसंद नहीं" । वे हँस देतीं और पानी का गिलास आगे बढ़ातीं । मैं गट-गट पूरा गिलास पी जाता । अख्तर उनके आँचल से मुँह पौंछता और फिर से मुस्तैद हो जाता ।

वो नहाकर, आँगन में बाल सुखाने आ जाती । अख्तर दुबक जाता । होते हुए भी न होना जताकर, वहीं बना रहता । बालकनी और आँगन के दरमियाँ । हमारी निगाहों से जुड़ने वाले धागे से टंगा हुआ । वो अपने बाल झटकते हुए एक चोर नज़र से मुझे देखती और फिर अनदेखा जताने लगती । मैं किताब में अपना सर घुसा जताने लगता । सिलसिला जो उसने शुरू किया था, वो बढ़ने लगता । जब उसे अपनी हार का एहसास होने लगता तो वह अपना तुरुप का इक्का चलती और उठकर भीतर चली जाती । और मैं उसकी इस जीत पर मुस्कुरा उठता ।

अख्तर उठ खड़ा होता और दाव लगाने लगता । मैं उसे आगाह करता कि अपने दस रुपये बचा सकते हो तो बचा लो । वो किसी मँझे हुए जुआरी की तरह दाव लगाता "अब नहीं आयेगी" । और मैं कहता कि "आयेगी, भले तौलिया पलटने के बहाने से आये लेकिन वह अपनी जीत का जश्न मनाने जरुर आयेगी " । वह मुँह में रिबन दबाये, बालों को गोल-गोल घुमाते हुए आँगन में आ खड़ी होती । मैं मुस्कुरा उठता और वह तार पर पड़े तौलिया को सही करती फिर एक नज़र मुझे देखती, मुस्कुराती और बालों को बाँधते हुए चली जाती ।

अख्तर दस का नोट आगे बढाते हुए कहता "भाभी जान की इस मुस्कराहट पर दस क्या, करोड़ों कुर्बान" ।


11 comments:

richa said...

गुलाबी मौसम में गुलाबी इश्क़ की गुलाबी यादें... इस पर तो वाकई करोड़ों कुर्बान :)

Puja Upadhyay said...

गज़ब बारीकी से लिखते हो...कमाल की नज़र पायी है...हमारे भी करोड़ों कुर्बान!

shikha varshney said...

इतनी प्यारी बयानगी पर तो वाकई करोड़ों कुर्बान.

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर लेखन, नायब अंदाज़. बधाई.

सागर said...

हाय ! वे हमारे दिन थे.

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

प्रिया said...

ये "वो" बड़ी कमाल की चीज़ हैं ......हम ब्लोगरे हिंदुस्तान जानना चाहते हैं .....आगे क्या हुआ...तफसील से बताया जाए

प्रिया said...

:-) ye smiley choot gaya tha

monali said...

Interesting... sabse mazedaar to ye k aap ladki me apni future wife bhale na dekh pao.. yaaro ko bhabhi dikhne lagti h.. i toh lyked it :)

पुष्यमित्र said...

आपने एक शब्द की बेईमानी की है. लड़की मुस्कुराई नहीं होगी. मेरे जीवन में भी ऐसे कई गुलाब खिले और मुरझाये हैं...

Rajey Sha राजे_शा said...

कभी कभी हमें खुद से ही पूछना चाहि‍ये, कि‍ तब तक तो सब ठीक था, अब क्‍या हुआ ?

 

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