Friday, 16 November 2012

अख्तर मियाँ और अलीगढ़




वो जाने से पहले दबे पाँव चुपके से मेरे पास आयी, देहरी पर ठिठकी और फिर ना जाने क्या सोच कर उन्हीं क़दमों से वापस मुड़ गयी . उसके चले जाने के बाद मैं सोच में था कि इस दफा ऐसा क्या था जो उसने एक शब्द भी कहे बिना इतना कुछ कह दिया हो . फिर ना जाने क्यों उन मुई किताबों में जी नहीं लगा . ना फिजिक्स का जहाज रास आया और ना ही गणितज्ञ बनने के अपने पुराने स्वप्न ही ने लुभाया। इस दफा ऐसा लगा कि जैसे फिज़ाओं से ख़ुशबू चली गयी हो, कि जैसे पंक्षियों ने भी उसका साथ पकड़ लिया हो, कि जैसे कोई जादुई स्वप्न टूट गया हो, कि जैसे....

ऐसे ना जाने कितने "जैसे" थे जो एकत्रित हो गए थे .

मन ने भी मेरा साथ छोड़ दिया हो . और उसी मन को तलाशने मैं छत पर चला गया . जहां से उसकी उलटी-पुलटी शक्लें मुझे आये दिन दिखाई देती थीं . किन्तु आज जिस शक्ल को मैं तलाशने गया था वो तो वहाँ थी ही नहीं . कितने सारे प्रश्न थे जो जमां हो गए थे।

तभी उन प्रश्नों को भेदती हुई आवाज़ आयी .

 "अमां मियाँ, तुम यहाँ हो . और हम हैं कि, पूरा आगरा घूम लिया तुम्हारी खातिर"

मुड़ कर देखा अख्तर खड़ा था .
"तबियत तो दुरुस्त है ?" माथे पर हाथ रख कर अख्तर मियाँ देखते हैं .
मैं झूठी मुस्कान होठों पर लाता हूँ  .
"अमां हुआ क्या है ? बताओगे कुछ ?"
"कुछ नहीं अख्तर"
 "अब देखो ये कुछ नहीं का मुरब्बा हमें ना खिलाओ, जल्दी से बताओ बात क्या है ?"
मैं उसकी इस बात पर मुस्कुराता हूँ .
"देखो ये झूठी हँसी किसी और के सामने हँसना, बताओ माज़रा क्या है ?"
मैं अपना चेहरा सामने की छत की ओर  कर लेता हूँ .
"ओह तो माज़रा ये है, भाभी चली गयीं ?" अख्तर पास आकर पूँछता है
"हाँ"
"कहाँ ?"
"शायद अलीगढ़, अपनी मौसी के यहाँ ?" मैं दूसरी छत की ओर देख कर ही जवाब देता हूँ
"कुछ कहा, कुछ बोल कर गयीं?"
"नहीं"
"सही है, वो भी कब तक कहती रहेंगी। यहाँ फर्क किस पर पड़ता है" अख्तर थोडा गुस्से का रवैया अख्तियार करते हुए बोला।
      
मैं कुछ नहीं कहता, बस उस छत को निहारता रहता हूँ, जहां से हर रोज़ वो मुझे देखा करती थी .

"अब क्या सोचा है मियाँ ?"
"सोच कर क्या होना है ?"
"क्यों ? क्यों नहीं होना सोच कर "
"तो क्या होना है ?" मैं जैसे कि  सवाल ना पूँछ कर उससे जवाब चाहने लगा
"अलीगढ़"
"अलीगढ़, मतलब"
"अलीगढ चलते हैं" अख्तर ने जैसे मेरे मन का हाल जान लिया हो
"दिमाग सही है, अलीगढ़ चलते हैं। मतलब क्या करेंगे अलीगढ़ जाकर, और रुकेंगे कहाँ ?" मैंने एक ही बार में कई सवाल अख्तर से कर डाले
"वो सब तुम मुझ पर छोड़ दो मियाँ, अरे उनकी मौसी हैं वहाँ तो हमारी भी कम रिश्तेदारी नहीं है अलीगढ़  में"
"तुम ना अख्तर मरवाओगे" मैं जैसे कि उस पर निर्भर होते हुए बोला
"अमां मियाँ ये किताबों से बाहर निकलना सीखो और भाभी से मिलने के सपने देखो"

और इस तरह तय हुआ कि किसी भी तरह, घर पर कोई बहाना बनाकर अलीगढ़ निकल पड़ना है .....

जारी....  

1 comments:

Puja Upadhyay said...

खुश-आमद-ईद!

 

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