Friday, 22 May 2015

तब मोहब्बत किस्तों में होती सी जान पड़ती

सुबहें तब खुशनुमा हुआ करती, दोपहरें तंग किया करती और शामें रात भर कर ढाँढस. मन किसी कटी पतंग सा उड़ता फिरता यहाँ वहाँ. घड़े भर पानी प्यास बुझाने में नाकामयाब सा दूर से देखा करता हर राहगीर को. और दिल लटक के घूमता फिरता खिड़की पे. 

इश्क़ मौसमी बेरोज़गारी सा लगता. क्योंकि तब नानियों और दादियों के घरों की देहरियां प्रतीक्षा की सुइयां टिकटिकाती. जो भरे पूरे आँगन चहचहाया करते वे छुट्टियां आते ही बेजान हो जाया करते. 

लगता क़ि मोहब्बत ने एक ब्रेक ले लिया हो.
*******************************

चन्द मुट्ठी भर दोस्त और आसमान भर दुआयें हुआ करती. नासमझी और मोहब्बत से भरे वे शुरूआती दिन अपने कांधे पर खुशियाँ टांग लाते. बरसाते दूर हुआ करती और तमाम खिले फूल चढ़ चुके होते. बीच में कहीं ठहरा और सुस्ताते क़दमों से बढ़ता सूरज दिनों को बेहद तपा देता. 

सूने पढ़े आंगन और दरवाजों पर ताले प्रतीक्षा की एक लंबी रेखा खींच देते. की देखो तुम इस पार हो और वो उस पार. और उस एक बात को परे धकेल देने के अनेकों प्रयत्न में आ जुड़ती उसकी याद. 

यादें फिर इश्क़ का समंदर हो जाया करती. तब मैं उसमें डूबता उतराता. और फिर किसी एक पल वे मुझे उस खिंची रेखा के इस पार आ धकेलतीं.
*******************************
उन्हीं किन्हीं दिनों में जब छुट्टियां मुँह चिढ़ाती सी सामने आ खड़ी होतीं. अख़्तर तब एक बात अक्सर सुना करता कि ये दिल किसी जंग खाये घंटे सा किसी स्कूल में टंगा जान पड़ता है जो लाख बजना चाहे किन्तु स्वंय की भी आवाज़ें भूल गया जान पड़ता है. 

और अख़्तर मियाँ कहते अमाँ यार ये छुट्टियाँ न हुई सरहद पर खड़े दुश्मन हो गए. 

और फिर हम तका करते उस सुबह के सूरज को जो उस आँगन को रौशन कर दे और हमारी सूनी पड़ी बालकनी फिर से आबाद हो जाये. 

मोहब्बत तब किस्तों में की हुई सी लगती.

0 comments:

 

हसरतसंज © 2008. Template Design By: SkinCorner