Friday, 20 May 2011

किताब की नायिका एवं महत्वपूर्ण पात्र


मैं जब उनसे मिला था, तब सर्दियों के दिन थे. तब शुरू के दिनों में वह मेरे लिए अन्जाना शहर था. बाद छुट्टी के मैं रेलवे ट्रैक के किनारे बैठा सिगरेट फूँका करता था. और जब मन बेहद उदास हो जाया करता, तब मैं वापस अपने कमरे पर जा किसी उपन्यास के पृष्ठ पर निगाहें गढ़ा लेता. और विचार के खंडहरों में बेहद अकेला घूमता रहता.

वे सब एक-एक करके मेरी जिंदगी में आये या यूँ कहूँ कि उनकी जिंदगियों में मैं आया. कभी-कभी ऐसा होता है कि दुनियावी रौशनी में कोई एक शख्स आपको अलग ही रौशनी में नहाया दिखाई पड़ता है. उस झूठ के संसार में सच का दिया जलाए रखने वाला शख्स. वह हर उन पलों में आपको बेहद करीब और अपना लगता है, जितना आप उसे जानने और समझने लगते हैं.

वे तीनों मेरी जिंदगी के आकाश में गए बेशकीमती सितारे हैं. उन्हें पा लेने जितना हुनर मुझे नहीं आता, वे तो स्वंय ही मेरी किस्मत के दामन में गए. कैसे, क्यों और किस तरह से यह सब हुआ, इतना जानने समझने का वक़्त ही नहीं मिला. बहरहाल....

वे मेरी जिंदगी की किताब के बेहद महत्वपूर्ण पात्र हैं. उनके बिना यह किताब लिखी ही नहीं जा सकती. हाँ उनके होने से यह किताब अनमोल अवश्य हो जाती है.

प्रथम पात्र :

उनकी उम्र रही होगी यही कोई पैंतीस-सैंतीस साल. हाँ बाद के दिनोंमें जब उनका जन्म दिन आया तो उनकी उम्र में एक-आध बरस का इजाफा और हुआ होगा. बहरहाल......

सवाल उम्र का नहीं-समझ और विचारों का है. वे पहली नज़र में ही समझदार और सुलझी हुई महिला नज़र आती हैं. हाँ, जैसे-जैसे आप उनके करीब पहुँचते जाते हैं, और वे आपको मित्र के रूप में अपना लें तो उनके दिल की गिरहें खुलती चली जाती हैं. और उनके दिल में रह रही तमाम उलझनें आपसे रू--रू होने लगती हैं. हाँ इसके लिए आपका इंसान होना आवश्यक है. नहीं तो आप उनके दिल के बाहर खड़ी दीवार तक भी पहुँच सकें, ये आसान जान नहीं पड़ता.

वे दिमाग से सुलझी हुई और दिल से बेहद उलझी हुई स्त्री हैं- ऐसा मैंने हमारी पहचान के बाद दिनों में कहा था. और वे मुस्कुरा उठी थीं.

उनमें चुम्कीय आकर्षण है. जो आपको खींचे ही चला जाता है. जितनी वे बाहर से खूबसूरत दिखती हैं, असल में उससे कई गुना वे दिल से खूबसूरत हैं. किसी एक रोज़ मैंने उनकी आंतरिक खूबसूरती के मोहवश उनसे कहा था. यदि आप मेरी हम उम्र होतीं तो शायद मैं आपके प्रति प्रेमिका रूपी मोह में पड़ जाता. तब उन्होंने अपने मन के बेहद कोमल कोणों से इस बात को जाना और समझा था. और हम करीब से करीब गए थे.

वे मेरी बेहद प्रिय मित्र हैं. मेरी जिंदगी में उनका निजी और महत्वपूर्ण स्थान है.

जब वे साहित्यिक चर्चाएँ करती हैं, तब बेहद अच्छी लगती हैं. तब लगता ही नहीं कि हमारी उम्रों में एक दशक का फासला है. वे एकदम से अपनी उम्र से दौड़कर मेरी उम्र की सीमारेखा को भेदती हुई, मन की आंतरिक सतह को स्पर्श कर लेती हैं.

नवम्बर के वे बीतते दिन मेरे दिल की डायरी में सदैव जीवित रहेंगे. जिन दिनों में वे मेरी जिंदगी का अहम् हिस्सा बन गयी थीं.


किताब की नायिका :

इस शहर ने मुझे वो सब कुछ दिया, जिसके वगैर मेरी जिंदगी अधूरी थी.

दिसंबर के उन निपट निर्धन दिनों में उसने मेरे दिल पर दस्तखत किये थे. और एकाएक ही मेरी जिंदगी मुझे बेशकीमती लगने लगी थी. जो भी हो, उससे पहले मुझे जिंदगी से रत्ती भर भी प्रेम नहीं था.

सच
कहूँ तो ये वे दिन थे, जब उसको हमेशा के लिए पा लेने की चाहत ने दिल में जन्म ले लिया था. मेरे मन की निर्ज़ां घाटियों में वह इन्द्रधनुष बनकर छा गयी थी.

वो मेरी उम्र का दस्तावेज़ है . जिसका हर शब्द हमारी मोहब्बत की स्याही से लिखा गया है।

तब तलक मैं अपनी जिंदगी के प्रति जवाबदेह नहीं था. जब वह मेरी जिंदगी में आई, मेरे मन ने मुझसे जवाब मांगने प्रारम्भ कर दिए थे. क्या मैं इन लम्हों को यूँ ही ख़ामोशी से बीत जाने दूँगा ? क्या जो हो रहा है, या होना चाह रहा है, उसका ना होना जता कर, इस सबसे अंजान बना रहूँगा ?

और तब मेरे अपने स्वंय ने आवाज़ दी थी - नहीं

तभी मन में उस चाहना ने जन्म ले लिया था. जिसका दायरा उसी से प्रारम्भ होता और उसी पर ख़त्म. उन्हीं दिनों मन में एक ख़याल आया-
"उसकी मासूमियत और सादगी पर मैं अपनी जान दे सकता हूँ"

लेखन मेरे लिए प्रथम था, शेष सुखों के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं. उन्हीं बाद के दिनों में मुझे यह आंतरिक एहसास हुआ - जाने कबसे वह मेरे प्रथम के खांचे में जा जुडी है.

बावजूद इसके कि हमारे मध्य महज़ औपचारिक बातें हुई थीं. वह भी बामुश्किल दो-चार दफा. किन्तु उसके होने मात्र से वह आंतरिक चाहना मन की ऊपरी सतह पर तैरने लगती थी. और मैं उसके प्रेमपाश में हर दफा ही, उसकी ओर खिंचा चला जाता रहा.

तब मुझे इतना भी ज्ञात था कि वह मेरे बारे में कितना कुछ वैसा ही सोचा करती है, जितना कि मैं. हाँ, केवल इस बात का भरोसा होने लगा था कि वह इंसानी तौर पर मुझे पसंद अवश्य करती है. कभी-कभी उसकी आँखों से प्रतीत होता कि इनमें कितना कुछ छुपा है. वो सब जो शायद मैं नहीं देख पा रहा, या शायद वो सब जो वह दिखाना नहीं चाहती.

वे ठिठुरती सर्दियों के ख़त्म होने वाले जनवरी के दिन थे. जब उसकी आँखों में मैंने अपने लिए चाहत पढ़ी थी. फिर जब-जब वह मेरे सामने आई, उन सभी नाज़ुक क्षणों में मेरे मन में प्रेम का अबाध सागर उमड़ पड़ता. जो सभी सीमारेखाओं को तोड़ता हुआ उसको अवश्य ही भिगोता रहा होगा. बहरहाल.......

फरवरी और मार्च के मिले जुले गुलाबी दिन बीत चुके थे. और मैं अपने दिल की बात, दिल में ही कैद करके रहता था. और वो जानती थी कि किसी एक रोज़ मैं उससे अवश्य कहूँगा- "तुम मेरी जिंदगी की किताब की नायिका हो"

उन दिनों उसकी आँखें बेहद उदास रहने लगी थीं. जबसे उसे पता चला था कि मैं इस कार्यस्थल को छोड़कर चले जाने वाला हूँ. उसकी गहरी उदास आँखों में मैं डूब-डूब जाया करता था. मन बेहद दुखी था और एक अजीब रिक्तता ने मुझे घेरा था. कई-कई बार मैंने उससे कुछ कहना चाहा और हर बार ही मेरे अपने स्वंय ने रोके रखा.

वे मार्च के बेहद उदास दिन थे.

मेरे लिए तब वह आत्मिक संघर्ष का दौर था. मन में संशय उपजता था कि कहीं यह खाली हाथ रह जाने के दिन तो नहीं और फिर अगले ही क्षण मैं मन को थपथपाता, समझाता और बहलाता. किन्तु वह केवल मुस्कुरा कर रह जाता. शायद कहना चाहता हो -"बच्चू इश्क कोई आसान शह नहीं"

और हुआ तब यह था कि अंततः जब वह स्वंय की भावनाओं पर नियंत्रण ना रख सकी थी . तब एक रोज़ वह मेरी दी हुई किताबों को मुझे वापस देने चली आयी थी.

वे बेहद भावुक क्षण थे.

वह मेरे इतने करीब थे, जितना कि पहले कभी नहीं रही थी. उसकी भावनाएं उसके चेहरे पर लकीर बनकर उभर आयी थीं. वह मेरे चले जाने की खबर से बेहद खफा थी- जबकि अब तक मैंने उससे अपनी भावनाओं को साझा भी नहीं किया था. शायद बात यही रही होगी. यहीं आत्मिक पीड़ा उपजती है. और मैं उस क्षण उसकी पीड़ा को महसूसने लगा था.

मैंने उससे इतना ही कहा था-"इन किताबों को वापस क्यों कर रही हो? इन्हें तो मैंने पढने के लिए ही दिया है" और तब उसने कहा था "जब आप ही जा रहे हैं, तो इन किताबों को मेरे पास छोड़कर चले जाने की कोई वजह नहीं बनती. मुझे नहीं पढनी आपकी किताबें."

हमारे बीच गहरी ख़ामोशी छा गयी थी.

फिर जाने कैसे मेरे दिल से ये शब्द निकले थे "तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो"
और उसने कहा था "जानती हूँ"

उसका चेहरा तब खिल उठा था.

फिर बीते दिनों की उसको हाथ देखने की बात याद हो आयी थी. जब उसने पूँछा था "क्या देख रहे हो ?" और मैंने टाल दिया था कि "फिर कभी बताऊंगा, वक़्त आने पर."

उसने जानना चाहा "उस रोज़ हाथ में क्या देख रहे थे" तब मैंने गहरी सांस ली थी और कहा था "तुम ही वो लड़की हो जिसके साथ मैं जिंदगी भर खुश रहूँगा."
शायद वह जान गयी होगी यह उन लकीरों की नहीं, मेरे दिल की आवाज़ है.

मेरी इस बात पर वह खिलखिला उठी थी.

और अगले दो रोज़ बाद उसने अपना दिल की बातों को किसी पवित्र नदी की तरह बह जाने दिया था. जिसका हर शब्द मेरे मन को स्पर्श करते हुए कह रहा था -"मैं तुमसे बेहद मोहब्बत करती हूँ."

सुनो आज मैं तुमसे एक बार फिर कहना चाहता हूँ - "तुम मेरे लिए इस दुनिया की सबसे खूबसूरत आत्मा हो."

Tuesday, 1 March 2011

गुलाबी इश्क़

वे शराफ़त के दिन थे । हम में अपने-अपने हिस्से की शराफ़त बची रहती थी । वो घंटों मुझे, तेरी वाली की खातिर, अपनी बालकनी में आसरा देता । हम तब तलक चाय के चार प्याले सुड़क जाते और उसकी अम्मी उफ़ तक ना करती । और वे जब खाना परोस देतीं तो हम अपना सुस्ताना जताते । चौथे बुलावे पर भी जब हम टस से मस ना होते तो वे कहतीं कि ऐसा भी क्या पहाड़ उठाये हो, जो एक निवाले तक की फुर्सत नहीं ।

मैं पहला निवाला उनके मुँह की ओर बढ़ाता तो वे मुस्कुरा उठतीं "बड़ी फ़िकर है हमारी, दस दफा बुलाने पर कदम हरकत करते हैं, ये भी नहीं कि अम्मी भूखी होंगी । जाओ हम नहीं खाते । मैं उनकी दो-चार मिन्नतें उठाता और पीछे से अख्तर अपना प्यार जताता । दो निवालों में ही उनकी भूख जाती रहती । और फिर हम दोबारा जंग में उतरने के लिए बड़े-बड़े कौर गले से जल्दी-जल्दी नीचे उतारने लगते । वे कहतीं "ऐसी भी क्या जल्दी है, ज़रा सा तो शऊर दिखाओ" और मैं कहता "शऊर भी कोई दिखाने की चीज़ है, ये जान लो अम्मी कि हमे दिखावा पसंद नहीं" । वे हँस देतीं और पानी का गिलास आगे बढ़ातीं । मैं गट-गट पूरा गिलास पी जाता । अख्तर उनके आँचल से मुँह पौंछता और फिर से मुस्तैद हो जाता ।

वो नहाकर, आँगन में बाल सुखाने आ जाती । अख्तर दुबक जाता । होते हुए भी न होना जताकर, वहीं बना रहता । बालकनी और आँगन के दरमियाँ । हमारी निगाहों से जुड़ने वाले धागे से टंगा हुआ । वो अपने बाल झटकते हुए एक चोर नज़र से मुझे देखती और फिर अनदेखा जताने लगती । मैं किताब में अपना सर घुसा जताने लगता । सिलसिला जो उसने शुरू किया था, वो बढ़ने लगता । जब उसे अपनी हार का एहसास होने लगता तो वह अपना तुरुप का इक्का चलती और उठकर भीतर चली जाती । और मैं उसकी इस जीत पर मुस्कुरा उठता ।

अख्तर उठ खड़ा होता और दाव लगाने लगता । मैं उसे आगाह करता कि अपने दस रुपये बचा सकते हो तो बचा लो । वो किसी मँझे हुए जुआरी की तरह दाव लगाता "अब नहीं आयेगी" । और मैं कहता कि "आयेगी, भले तौलिया पलटने के बहाने से आये लेकिन वह अपनी जीत का जश्न मनाने जरुर आयेगी " । वह मुँह में रिबन दबाये, बालों को गोल-गोल घुमाते हुए आँगन में आ खड़ी होती । मैं मुस्कुरा उठता और वह तार पर पड़े तौलिया को सही करती फिर एक नज़र मुझे देखती, मुस्कुराती और बालों को बाँधते हुए चली जाती ।

अख्तर दस का नोट आगे बढाते हुए कहता "भाभी जान की इस मुस्कराहट पर दस क्या, करोड़ों कुर्बान" ।


Thursday, 27 January 2011

देहरी से आगे का मकान

सर्द हवाएँ जब-तब अपना सिर उठातीं और कुछ ही क्षणों बाद दुबक कर सुस्ताने लगतीं . इस बात का बिल्कुल एहसास न होता कि अभी-अभी जो बीते हैं वे वही दिन थे, जब शहर दुबका पड़ा था, गलियारे सूने पड़े थे और बच्चे अक्समात घोषित छुट्टियों को, अनायास मिले सुख के तरह भोग रहे थे .

वे फरवरी के दिन थे .

वह धूप सेंकते आँगन से अपनी साइकिल निकालती और बाहर गली में दूर तक हैंडल थामे पैदल चलती रहती, जब तक कि मेरे घर की देहरी पीछे न छूट जाती . और तब वह पैडल घुमाती हुई दूर निकल जाती . हाँ इस बीच वह पलट कर देखती, उसकी आँखें देहरी के उस पार जातीं और कुछ ही क्षणों में देहरी लाँघ कर वापस अपने तक सीमित हो जातीं .

मैं उसे दूर तक टकटकी बाँधे खिड़की से जाते हुए देखता . इस तरह कि वह मेरा देखना न देख सके . उसके चले जाने पर, उसके पीछे रह गयी उसकी इच्छा को देखता, जो अभी तक देहरी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती . अपनी उदास आँखों से मुझे तलाशती कि मैं वहाँ हूँ या नहीं . देहरी के भीतर हूँ या उसी की तरह देहरी के बाहर . जब वह तलाशते-तलाशते थक जाती तो कुछ देर सुस्ताने बैठ जाती . वहीँ उसी गली के अंतिम छोर पर . और मैं होकर भी अपना न होना जताता रहता .

वे हमारे शीतयुद्ध के दिन थे .

कभी-कभी ऐसा होता कि वह मनु से मिलने का बहाना कर मुझसे मिलने आती . कुछ क्षण देहरी पर ठिठकी रहती, जैसे वह कोई लक्ष्मण रेखा हो, जिसको लांघने से हमारे बीच के वनवास के दिन और बढ़ जायेंगे . और उस एक क्षण मैं उसके ठिठके कदमों पर नज़र गाढ़ देता तो वह एक ही झटके में भीतर प्रवेश कर जाती . जैसे कि अभी बीते क्षण वह यहाँ थी ही नहीं - केवल मेरा भ्रम था . किन्तु वह होती, अपने में पूर्ण, मुकम्मल .

और मैं वहाँ से उठकर अपने भीतर के कमरे में चला जाता . किन्तु वह केवल दिखावा होता - बाहरी आडम्बर . अपना रूठा हुआ जताने की खातिर, किया हुआ प्रयत्न . उस एक बच्चे की तरह, जिसे जब तक न मनाओ, वह रूठा ही रहता है . यदि आप अपना ध्यान उससे हटा लेते हैं तो वह ऐसी हरकतें करने लगता है कि आपका ध्यान उस पर जाए .

वह कई-कई घंटे मनु से चिपकी रहती . उससे न बात करते हुए भी बात करती रहती . प्यास न लगने पर भी घूँट-घूँट पानी पीती . और बरामदे में रखे घड़े से मनु तक का सफ़र इतनी आहिस्ता से तय करती कि वह हिमालय की चढ़ाई चढ़ रही हो . फिर मनु से कोई ऐसी चीज़ माँगती जो केवल मेरे कमरे में हो . और तब मनु मेरे कमरे में आती, एक नज़र मुझे देखती और मैं अपनी निगाहें किताबों में गढ़ा लेता . ऐसे दिखाता कि मैंने जाना ही ना हो कि वह अभी यहाँ खड़ी है . ठीक देहरी के भीतर, मेरे कमरे में, जहाँ मैं न होना दिखाते हुए भी हूँ -किताबों से झूठ-मूठ का चिपका हुआ . जाते हुए वह कहती "कुछ चाहिए" . मैं गर्दन ऊपर उठता, उसके चेहरे को देखता और तब वह चली जाती - फिर से आने के लिए .

जब शीत युद्ध के दिन लम्बे हो जाते . तब मैं ऊबने लगता . उससे मिलने के लिए, बात करने के लिए तड़पने लगता . भीतर ही भीतर अपने पर फट पड़ता . दिल रोने को करता और अपने किए को कोसता . वह ना जाने कैसे जान जाती . जैसे उसके पास कोई यन्त्र हो, जिसे उसने मेरी परिधि के चारों और लगा रखा हो . जो मेरी पीड़ा, मेरी तड़प को भाँप लेता हो - अब कम है, अब ज्यादा . और जब वह सीमा रेखा को लाँघ जाती, तब वह आती किसी बुझती शाम को रोशन करने .

माँ कहीं बाहर होती और मनु रसोई में . वह बिना कोई आहट किए, मेरी देहरी को लाँघकर, कब मेरे सिरहाने आ खड़ी होती, पता ही न चलता . उस एक क्षण यह भ्रम होता कि वह केवल कोई बासी याद है . जब वह गुलाबी सूट पहने है और कनखियों से मुझे निहार रही है . किन्तु वह वहाँ होती - सचमुच . एक नए दिन में बीती यादों के साथ . मैं करवट बदल लेता और तब उसकी सिसकियाँ कमरे में बहने लगतीं . एक कोने से दूसरे कोने तक .

तब अगले ही क्षण हम एक दूसरे के गले से लिपटे हुए होते . लगता ही नहीं कि अभी बीते क्षण, एक हफ्ते की दूरियों को ओढ़े हुए हमने अपनी-अपनी दुनिया बना रखी थी . बीते हफ्ते का जुदा स्वाद उसके ओठों पर आ जमा होता और मैं उसे अपने ओठों से वर्तमान में ले आता . तब वे धुले-धुले से नज़र आते . गीले, चमकते हुए . अपनी नई पहचान के साथ पुनः मेरे ओठों से आ मिलते .

वे पहली मोहब्बत के दिन थे .

Sunday, 16 January 2011

छुट्टियों के वे दिन

बाद छुट्टियों के हम घण्टों छत पर बैठे रहते . वो बीते दिनों के अपने दिल्ली के किस्से सुनाती रहती . उसके किस्सों में दुहराव आने पर भी यकीन न होता कि यह वही बात है जो उसने बीते रोज़ सुनाई थी . मैं अपनी आँखें मूँद लेता और मन की सतह पर उसके स्वर को महसूस करता . और तब एकाएक वह पूँछती "तुमने पीछे क्या किया ?"

मैं आँखें मूँदे रहता, इस कोशिश में कि यह केवल मेरा भ्रम है . नहीं तो इस कठिन प्रश्न का उत्तर क्या मैं दे सकूँगा ? क्या यह शब्दों में समाहित हो सकेगा ? नहीं ! और मैं प्रयत्न करता, कि मैं बच सकूँ . अपने अकेलेपन को दूर धकेल सकूँ . जिसने बीती छुट्टियों में मुझे आ घेरा था . जब वह दिल्ली में थी और मैं यहाँ - एकदम खाली, निपट अकेला . और जब वह चली जाती तब मैं तौलता, कभी इस पलड़े पर रखकर तो कभी उस पलड़े पर रखकर - अपने बीते अकेले दिनों को .

क्या यह एक उत्तर में उतर सकेगा कि उसके पीछे उसकी याद को परे धकेलने का अंतहीन प्रयास होता . किन्तु उसकी याद मन की सतह पर रेंगती रहती, एक सिरे से दूसरे सिरे तक और हर सिरा घूमकर पुनः स्वंय से जा मिलता .

मई-जून के वे सुलगते दिन इतने लम्बे और उबाऊ होते कि कहीं भाग जाने को दिल करता . दोपहर को नीम की निमोरियाँ झरतीं और गर्म हवा के थपेड़े जब गालों को झुलसा देते, मैं बीती सर्दियों में उसका लिखा पत्र निकाल लेता . और उसकी दुनिया में प्रवेश कर जाता - शीतल, सुरक्षित और अपने में पूर्ण . मैं एक ही पंक्ति को कई रूपों में पढ़ता, एक बार, दो बार, अनेकों बार .

देर शाम जब उसकी याद की हूक उठती तो घण्टों छत पर औंधे मुँह पडा रहता . जहाँ वो बातें किया करती थी . तब दिल्ली, शहर नहीं, अपने में एक सम्पूर्ण देश प्रतीत होता - दूर, बहुत दूर . जहाँ वह अपनी छुट्टियाँ बिता रही होगी . और हर बीते एक दिन का किस्सा अपनी स्मृति में कैद कर रही होगी . ताकि जब वह यहाँ आये तो हमारे मध्य मौन न पसर जाए .

जब वह यहाँ, अपने बीते दिनों को वर्तमान के इन दिनों में घसीट लाती तो बीत गया अकेलापन भी उनके साथ घिसटता हुआ चला आता . और तब मैं शून्य में निहारती उसकी आँखों को देखता जो वहाँ से बटोर-बटोर कर उन बातों को मेरे पास ले आती . अपने उन अकेले दिनों को, जिन पर वो इन किस्सों की पर्त चढाने का प्रयत्न करती, किन्तु वे रह-रह कर चमक उठते, कभी इस कोने से तो कभी उस कोने से .

और तब उसके उन बीते दिनों के अकेलेपन की सीमा रेखा को भेदता हुआ, मेरा अकेलापन जा मिलता . उन्हें पहचानना दुरूह हो जाता, कि यह उसका कोना है और वह मेरा कोना . वह मन की सतह पर काई की तरह जमा रहता . हम उसे खुरच कर बुहारने का भरसक प्रयत्न करते किन्तु उसके बाद के वे धब्बे फिर भी चमकते रहते - अपनी नई पहचान के साथ .
 

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